भारत की अर्थव्यवस्था में मानसून की एक बेहद ही महत्वपूर्ण भूमिका है। देश की खेती, ग्रामीण और खाद्य कीमतें बारिश पर काफी हद तक निर्भर करती हैं। ऐसे में अगर सुपर अल नीनो जैसी शक्तिशाली जलवायु घटना के कारण मानसून प्रभावित होता है, तो इसका असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रह सकता है। कृषि उत्पादन घटने और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ने का खतरा पैदा हो सकता है।

यही एक बड़ा कारण है कि जब भी सुपर अल नीनो की चर्चा होती है, तो अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ जाती है। आखिर सुपर अल नीनो क्या है और यह भारत की अर्थव्यवस्था को किस हद तक नुकसान पहुंचा सकता है, आइए आसान भाषा में समझते हैं….

अल नीनो क्या है?

अल नीनो (El Niño) एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म होने पर होती है। इसका असर केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया भर के मौसम, बारिश और तापमान के पैटर्न को प्रभावित करता है। भारत में अल नीनो अक्सर मानसून को कमजोर कर देता है, जिससे सामान्य से कम बारिश होने की आशंका बढ़ जाती है।

‘अल नीनो’ शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले 1600 के दशक में दक्षिण अमेरिका के मछुआरों ने किया था। स्पेनिश भाषा में इसका अर्थ ‘लिटिल बॉय’ या ‘क्राइस्ट चाइल्ड’ होता है, क्योंकि यह घटना आमतौर पर क्रिसमस के आसपास अपने चरम पर पहुंचती है। यह घटना आमतौर पर हर 2 से 7 साल में एक बार होती है और 12 से 18 महीने तक बनी रह सकती है।

अल नीनो कैसे उत्पन्न होता है?

सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर के ऊपर चलने वाली व्यापारिक हवाएं गर्म पानी को पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र की ओर धकेलती हैं। लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या उनकी दिशा में बदलाव आता है, तो गर्म पानी मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में जमा होने लगता है।

गर्म पानी के इस जमाव से समुद्र की सतह का तापमान बढ़ जाता है और वायुमंडलीय दबाव में भी बदलाव आने लगता है। इसके कारण मौसम के सामान्य पैटर्न में गड़बड़ी पैदा होती है। अल नीनो के दौरान निम्न दबाव का क्षेत्र मध्य प्रशांत की ओर खिसक जाता है, जबकि पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में उच्च दबाव जैसी स्थिति बनने लगती है। वायुदाब के इस बदलाव को ‘सदर्न ऑसिलेशन’ कहा जाता है।

सुपर अल नीनो क्या है?

जब प्रशांत महासागर के मध्य-पूर्वी भाग में समुद्री सतह का तापमान सामान्य से लगभग 2 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है और यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तब इसे सुपर अल नीनो कहा जाता है।

अब तक कितनी बार आया है सुपर अल नीनो?

वैज्ञानिक रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले लगभग 75 वर्षों में तीन प्रमुख सुपर अल नीनो घटनाएं दर्ज की गई हैं:

  • 1982-83 का सुपर अल नीनो
  • 1997-98 का सुपर अल नीनो
  • 2015-16 का सुपर अल नीनो

अब तक का सबसे शक्तिशाली सुपर अल नीनो अब आया था?

वैज्ञानिकों के अनुसार, 1997-98 का अल नीनो आधुनिक रिकॉर्ड में सबसे शक्तिशाली सुपर अल नीनो घटनाओं में से एक माना जाता है। National Oceanic and Atmospheric Administration के जलवायु विशेषज्ञों ने 2015 में कहा था कि 1997-98 का अल नीनो रिकॉर्ड में सबसे मजबूत बना हुआ है, जबकि 2015-16 की घटना उसकी बराबरी के करीब पहुंची थी।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है अल नीनो?

भारत की लगभग आधी कृषि भूमि आज भी मानसून की बारिश पर निर्भर है। दक्षिण-पश्चिम मानसून देश की वार्षिक वर्षा का करीब 70% हिस्सा प्रदान करता है।

अल नीनो की स्थिति में अक्सर भारतीय मानसून कमजोर पड़ जाता है। हालांकि हर अल नीनो वर्ष में सूखा पड़े, यह जरूरी नहीं है, लेकिन ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि कई कमजोर मानसून वर्षों के पीछे अल नीनो की भूमिका रही है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार अल नीनो और भारतीय मानसून के बीच लंबे समय से संबंध देखा गया है, हालांकि हाल के वर्षों में यह संबंध कुछ कमजोर भी हुआ है।

सुपर अल नीनो से भारतीय कृषि को कितना नुकसान हो सकता है?

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत प्रकाशित एक PIB लेख के अनुसार, भारत का लगभग 60% शुद्ध बोया गया क्षेत्र (Net Sown Area) वर्षा आधारित (Rainfed) है, जो देश के कुल खाद्य उत्पादन में करीब 40% योगदान देता है। ऐसे में मानसून कमजोर पड़ने का सीधा असर कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है।

सुपर अल नीनो के कारण यदि बारिश सामान्य से कम होती है, तो सबसे पहले खरीफ फसलें प्रभावित हो सकती हैं। इनमें धान, दालें, मक्का, सोयाबीन, गन्ना और कपास जैसी फसलें शामिल हैं। कम वर्षा की स्थिति में बुआई क्षेत्र घट सकता है, सिंचाई पर लागत बढ़ सकती है और उत्पादन में कमी आ सकती है।

Indian Express की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के लिए अल नीनो का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि देश की कृषि, जल संसाधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था काफी हद तक दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर हैं। ऐतिहासिक रूप से देखें तो 1950 के बाद आए 16 अल नीनो वर्षों में से 7 वर्षों में भारत को सामान्य से कम मानसूनी वर्षा मिली थी।

कृषि उत्पादन में कमी आने से किसानों की आय प्रभावित हो सकती है, ग्रामीण मांग कमजोर पड़ सकती है और खाद्य महंगाई बढ़ने का जोखिम भी पैदा हो सकता है। यही वजह है कि सुपर अल नीनो को भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम माना जाता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ सकता है?

सुपर अल नीनो के वजह से अगर मानसून कमजोर पड़ता है, तो इसका असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहता। कम बारिश से कृषि उत्पादन घट सकता है, जिससे खाद्य महंगाई बढ़ने का डर पैदा होता है। किसानों की आय और ग्रामीण मांग प्रभावित होने पर एफएमसीजी और उपभोक्ता वस्तुओं जैसे क्षेत्रों की बिक्री भी प्रभावित हो सकती है।

यही वजह है कि विशेषज्ञ सुपर अल नीनो को केवल मौसम की घटना नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक वृद्धि, महंगाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा जोखिम मानते हैं।

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