केंद्र सरकार ने हाल ही में विदेशी निवेशकों के लिए सरकारी बॉन्ड पर लगने वाले कैपिटल गेन्स टैक्स और ब्याज आय पर कर को खत्म करने का फैसला किया है। इस कदम का उद्देश्य भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेश को बढ़ावा देना है।

इसके बाद Government Securities (G-Sec) एक बार फिर चर्चा में आ गई हैं। लेकिन आखिर Government Securities क्या होती हैं और सरकार इनके जरिए पैसा कैसे जुटाती है? आइए आसान भाषा में समझते हैं…

क्या है सरकारी सिक्योरिटीज?

सरकारी सिक्योरिटीज डेब्ट इंस्ट्रूमेंट हैं जिसका इस्तेमाल सरकार द्वारा अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए जनता से पैसे उधार लेने के लिए किया जाता है। सरकारी सिक्योरिटीज (जिसे G-सेक भी कहा जाता है) रिस्क-मुक्त निवेश हैं क्योंकि वे भारत सरकार द्वारा समर्थित हैं। ये फिक्स्ड-इनकम मार्केट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और सरकारी सिक्योरिटीज मार्केट पर आसानी से ट्रेड किए जा सकते हैं।

सरकार को क्यों पड़ती है पैसा जुटाने की जरूरत?

सरकार G-सेक के माध्यम से पैसे जुटाकर, अपने खर्चों को पूरा करने, किसी भी बजट की कमी को फाइनेंस करने और देश के लिए बुनियादी ढांचे और समग्र विकास परियोजनाओं में निवेश करने की कोशिश करती हैं।

सरकारी सिक्योरिटीज कैसे काम करती हैं?

आप सरकारी सिक्योरिटीज को कॉर्पोरेट बॉन्ड के उदाहरण के माध्यम से समझ सकते है। बड़े संगठन विभिन्न बिजनेस ऑपरेशन को फाइनेंस करने या नए प्रोडक्ट जोड़ने या नए उपकरण खरीदने के लिए बॉन्ड जारी करते हैं। सरकार भी इसी प्रकार अपने खर्चों को पूरा करने के लिए इसे जारी करती हैं और जनता पर टैक्स बढ़ाने या अन्य परियोजनाओं पर खर्च को कम करने की आवश्यकता नहीं है।

सरकार द्वारा इन सिक्योरिटीज को जारी करने के बाद, व्यक्तिगत और संस्थागत निवेशक दोनों ही उन्हें खरीद सकते हैं। निवेशक मेच्योरिटी तक इन सिक्योरिटीज को होल्ड करने या उन्हें सेकेंडरी बॉन्ड मार्केट में ट्रेड करने का विकल्प चुन सकते हैं।

सरकारी प्रतिभूतियों के उदाहरण

– फ्लोटिंग रेट बॉन्ड
– राज्य विकास ऋण
– डेटेड सिक्योरिटीज (लॉन्ग-टर्म G-सेक)
– ट्रेजरी बिल (शॉर्ट-टर्म G-सेक)
– ट्रेजरी बॉन्ड आदि।

G-Sec कितने प्रकार की होती हैं?

RBI के अनुसार सरकारी प्रतिभूतियां मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं

ट्रेजरी बिल

ट्रेजरी बिल (T-Bills) अल्पकालिक सरकारी प्रतिभूतियां होती हैं, जिन्हें केंद्र सरकार अपनी अल्पकालिक वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए जारी करती है। इनकी अवधि 91 दिन, 182 दिन या 364 दिन की होती है। इनमें निवेशकों को नियमित ब्याज नहीं मिलता।

इन्हें फेस वैल्यू से कम कीमत (डिस्काउंट) पर जारी किया जाता है और मैच्योरिटी पर पूरा मूल्य चुकाया जाता है। इससे खरीद मूल्य और फेस वैल्यू के बीच का अंतर निवेशक का रिटर्न बनता है।

सरकारी बॉन्ड

सरकारी बॉन्ड या दिनांकित प्रतिभूतियां (Dated Securities) दीर्घकालिक सरकारी निवेश साधन होती हैं। इन्हें केंद्र सरकार लंबी अवधि के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से जारी करती है।

इनकी अवधि कुछ वर्षों से लेकर 40 वर्ष तक हो सकती है। इनमें निवेशकों को तय अंतराल पर निश्चित ब्याज (कूपन) मिलता है, जबकि मूलधन का भुगतान मैच्योरिटी पर किया जाता है।

G-Sec में कैसे निवेश कर सकते हैं आम निवेशक?

पहले सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश मुख्य रूप से संस्थागत निवेशकों तक सीमित था, लेकिन अब RBI के Retail Direct Platform के जरिए आम निवेशक भी सीधे G-Sec खरीद सकते हैं।

इसके अलावा म्यूचुअल फंड और बॉन्ड फंड के माध्यम से भी अप्रत्यक्ष रूप से निवेश किया जा सकता है।

G-Sec चर्चा में क्यों हैं?

हाल के दिनों में Government Securities (G-Secs) चर्चा में हैं क्योंकि केंद्र सरकार और RBI ने विदेशी निवेशकों को भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार की ओर आकर्षित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। सरकार ने जून 2026 में विदेशी निवेशकों के लिए सरकारी बॉन्ड पर लगने वाले कैपिटल गेन्स टैक्स और ब्याज आय पर कर को समाप्त करने का फैसला किया।

यह भी पढ़ें: Mis-selling क्या होती है? वित्तीय उत्पादों की बिक्री से जुड़े RBI के नए नियम समझिए

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों और रेगुलेटेड एंटिटीज द्वारा वित्तीय उत्पादों या सेवाओं की बिक्री से जुड़े नियम कड़े कर दिए। इस कदम का उद्देश्य लेंडर्स द्वारा फाइनेंशियल प्रोडक्ट की गलत बिक्री को रोकना, गलत मार्केटिंग तरीकों पर रोक लगाना और कस्टमर की सहमति, डिस्क्लोजर और बिक्री के तरीकों के नियमों को कड़ा करना है।

केंद्रीय बैंक ने टेक्निकल और ऑपरेशनल बदलावों की जरूरत को देखते हुए रिवाइज्ड गाइडलाइंस लागू करने की तारीख बढ़ा दी है। अब ये नियम जुलाई 2026 के बजाय 1 जनवरी 2027 से लागू होंगे। आइए समझते हैं कि मिस-सेलिंग क्या होती है…