भारत और इंडोनेशिया ने महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। हाल ही में जारी आधिकारिक India-Indonesia Joint Statement में दोनों देशों ने इस क्षेत्र में सहयोग मजबूत करने की बात कही है। दोनों पक्षों ने महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर हुए समझौते का भी स्वागत किया है।
यह समझौता ऐसे समय सामने आया है, जब मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक गाड़ियों, बैटरी और आधुनिक तकनीक में इस्तेमाल होने वाले खास खनिजों की चर्चा लगातार बढ़ रही है। ऐसे में सवाल है कि आखिर क्रिटिकल मिनरल्स क्या होते हैं और ये सामान्य खनिजों से कैसे अलग हैं? आइए आसान भाषा में समझते हैं…
क्या होते हैं क्रिटिकल मिनरल्स?
क्रिटिकल मिनरल्स ऐसे खनिज होते हैं जो आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी होते हैं। इनकी उपलब्धता में कमी या सप्लाई चेन में रुकावट अर्थव्यवस्था और रणनीतिक क्षेत्रों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
किसी खनिज को क्रिटिकल मानने में उसकी आर्थिक अहमियत और सप्लाई जैसे पहलुओं को देखा जाता है। अलग-अलग देश अपनी जरूरतों और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के आधार पर इनकी पहचान करते हैं।
भारत ने कितने क्रिटिकल मिनरल्स की पहचान की है?
Ministry of Mines ने 2023 में भारत के लिए 30 क्रिटिकल मिनरल्स की सूची जारी की थी। इसमें लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट, कॉपर, गैलियम, जर्मेनियम, रेयर अर्थ एलिमेंट्स, टाइटेनियम, टंगस्टन और वैनेडियम सहित कई खनिज शामिल हैं।
सरकार के मुताबिक, इन खनिजों की पहचान भारत की जरूरतों और प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर की गई है।
क्यों जरूरी हैं क्रिटिकल मिनरल्स?
PIB के आधिकारिक दस्तावेज के मुताबिक, क्रिटिकल मिनरल्स स्वच्छ ऊर्जा, आधुनिक टेक्नॉलाजी और कई महत्वपूर्ण उद्योगों के लिए जरूरी हैं। इनका इस्तेमाल अक्षय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों, इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार और रक्षा जैसे क्षेत्रों में होता है। उदाहरण के लिए, लिथियम, निकेल, कोबाल्ट और ग्रेफाइट जैसे खनिज बैटरी बनाने और उससे जुड़ी पूरी वैल्यू चेन में अहम भूमिका निभाते हैं।
भारत-इंडोनेशिया के बीच क्या सहमति बनी है?
भारत और इंडोनेशिया ने महत्वपूर्ण खनिज और दुर्लभ पृथ्वी तत्वों में सहयोग बढ़ाने की बात कही है। दोनों देशों ने सुरक्षित और टिकाऊ Supply Chains विकसित करने के लिए सहयोग मजबूत करने पर जोर दिया है। साथ ही क्रिटिकल मिनरल्स पर हुए MoU का स्वागत किया। इसके साथ ही निवेश तथा टेक्नॉलाजी पार्टनरशिप को बढ़ावा देने की बात कही है।
यहां सप्लाई चेन का क्या मतलब है?
क्रिटिकल मिनरल्स की वैल्यू चेन में एक्सप्लोरेशन, माइनिंग, बेनिफिशिएशन, प्रोसेसिंग और रीसाइक्लिंग जैसे चरण शामिल हैं। यानी मामला केवल जमीन से खनिज निकालने तक सीमित नहीं है। सरकार देश के भीतर एक्सप्लोरेशन और माइनिंग बढ़ाने के साथ प्रोसेसिंग, रीसाइक्लिंग और विदेशों में क्रिटिकल मिनरल एसेट्स हासिल करने पर भी जोर दे रही है।
भारत के लिए क्यों अहम हैं क्रिटिकल मिनरल्स?
भारत के लिए क्रिटिकल मिनरल्स की अहमियत लगातार बढ़ रही है, क्योंकि इनकी जरूरत स्वच्छ ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और आधुनिक टेक्नॉलाजी जैसे क्षेत्रों में होती है। इनकी सुरक्षित और लंबे समय तक उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार ने National Critical Mineral Mission (NCMM) शुरू किया है।
आधिकारिक मिशन दस्तावेज के मुताबिक, इसका उद्देश्य भारत की क्रिटिकल मिनरल वैल्यू चेन को मजबूत करना है। इसके तहत देश में एक्सप्लोरेशन और माइनिंग बढ़ाने, प्रोसेसिंग क्षमता विकसित करने, रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने और विदेशों में क्रिटिकल मिनरल एसेट्स हासिल करने पर जोर दिया गया है।
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