भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने क्रेडिट डेरिवेटिव्स से जुड़े नए मास्टर डायरेक्शन जारी किए हैं। ये नियम 25 जून 2026 से लागू हो गए हैं। आरबीआई ने बताया कि इन नियमों का मसौदा इस साल फरवरी में जारी किया गया था और उस पर मिले सुझावों के बाद अब अंतिम निर्देश लागू कर दिए गए हैं।
इन नए नियमों के तहत अब क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप (CDS) के साथ-साथ टोटल रिटर्न स्वैप (TRS) और क्रेडिट इंडेक्स से जुड़े डेरिवेटिव्स के लिए भी नियम तय किए गए हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि क्रेडिट डेरिवेटिव्स क्या होते हैं, आरबीआई ने नए नियम क्यों जारी किए और इनसे क्या बदलाव होंगे…
क्या होते हैं क्रेडिट डेरिवेटिव्स?
क्रेडिट डेरिवेटिव्स ऐसे वित्तीय अनुबंध होते हैं, जिनकी वैल्यू किसी कर्ज (Debt Instrument) या कर्ज के समूह (Debt Index) के क्रेडिट रिस्क पर आधारित होती है। आसान भाषा में कहें तो ये ऐसे साधन हैं, जिनके जरिए किसी बॉन्ड या अन्य डेट इंस्ट्रूमेंट में डिफॉल्ट का जोखिम एक पक्ष से दूसरे पक्ष को ट्रांसफर किया जा सकता है।
क्या है क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप (CDS)?
सीडीएस एक तरह का क्रेडिट डेरिवेटिव है। इसमें दो पक्ष होते हैं- प्रोटेक्शन खरीदार (Protection Buyer) और प्रोटेक्शन बेचने वाला (Protection Seller)।
प्रोटेक्शन खरीदार नियमित रूप से प्रीमियम देता है। इसके बदले प्रोटेक्शन बेचने वाला यह वादा करता है कि यदि तय किए गए बॉन्ड या कर्ज से जुड़ा कोई ‘क्रेडिट इवेंट’ यानी डिफॉल्ट जैसी घटना होती है, तो वह अनुबंध के अनुसार भुगतान करेगा।
क्या है टोटल रिटर्न स्वैप (TRS)?
टीआरएस भी एक क्रेडिट डेरिवेटिव है। इसमें एक पक्ष किसी डेट इंस्ट्रूमेंट से मिलने वाला पूरा आर्थिक रिटर्न (जैसे ब्याज और कीमत में बदलाव) दूसरे पक्ष को ट्रांसफर करता है। इसके बदले उसे पहले से तय फिक्स्ड या फ्लोटिंग रेट के आधार पर भुगतान मिलता है।
आरबीआई ने क्यों जारी किए नए नियम?
RBI ने बताया है कि फरवरी 2026 की मौद्रिक नीति में क्रेडिट इंडेक्स पर डेरिवेटिव्स और कॉरपोरेट बॉन्ड्स पर टोटल रिटर्न स्वैप (TRS) शुरू करने की घोषणा की गई थी। इसके बाद मसौदा नियम जारी कर सार्वजनिक सुझाव मांगे गए। अब मिले सुझावों के आधार पर अंतिम निर्देश जारी किए गए हैं।
नए नियमों में क्या बदला?
– अब ओवर-द-काउंटर (OTC) बाजार में Credit Default Swap (CDS) के साथ Total Return Swap (TRS) की भी अनुमति होगी।
– मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों पर सिंगल-नेम CDS, क्रेडिट इंडेक्स पर CDS और क्रेडिट इंडेक्स फ्यूचर्स शुरू किए जा सकेंगे। इसके लिए RBI की पूर्व मंजूरी जरूरी होगी।
– नए नियम OTC और एक्सचेंज-ट्रेडेड दोनों तरह के क्रेडिट डेरिवेटिव्स पर लागू होंगे।
कौन-कौन भाग ले सकेगा?
आरबीआई के अनुसार, भारत में रहने वाले पात्र प्रतिभागी और नियमों में तय सीमा तक विदेशी निवासी भी इस बाजार में हिस्सा ले सकेंगे। मार्केट मेकर के रूप में अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (कुछ श्रेणियों को छोड़कर), स्टैंडअलोन प्राइमरी डीलर, NBFC-Upper Layer, NBFC-Middle Layer (हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों सहित) तथा एक्जिम बैंक, नाबार्ड, एनएचबी, सिडबी और नाबफिड को अनुमति दी गई है।
किन डेट इंस्ट्रूमेंट्स पर होंगे ये कॉन्ट्रैक्ट?
इन नियमों के तहत मनी मार्केट डेट इंस्ट्रूमेंट्स, रेटेड रुपये वाले कॉरपोरेट बॉन्ड और डिबेंचर तथा इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों द्वारा स्थापित स्पेशल पर्पज व्हीकल (SPV) की ओर से जारी अनरेटेड रुपये वाले कॉरपोरेट बॉन्ड और डिबेंचर को रेफरेंस ऑब्लिगेशन या रेफरेंस एसेट बनाया जा सकेगा। वहीं, एसेट-बैक्ड सिक्योरिटीज, मॉर्गेज-बैक्ड सिक्योरिटीज और क्रेडिट एन्हांस्ड/गारंटीड बॉन्ड, कन्वर्टिबल बॉन्ड जैसी स्ट्रक्चर्ड ऑब्लिगेशंस को रेफरेंस ऑब्लिगेशन या रेफरेंस एसेट के रूप में अनुमति नहीं होगी।
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केंद्र सरकार ने हाल ही में विदेशी निवेशकों के लिए सरकारी बॉन्ड पर लगने वाले कैपिटल गेन्स टैक्स और ब्याज आय पर कर को खत्म करने का फैसला किया है। इस कदम का उद्देश्य भारतीय सरकारी बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेश को बढ़ावा देना है। यहां पढ़ें पूरी खबर…
