जर्मनी की दिग्गज ऑटोमोबाइल कंपनी फॉक्सवैगन ने अपने 89 साल के इतिहास का सबसे बड़ा रीस्ट्रक्चरिंग प्लान पेश किया है। शुक्रवार को कंपनी के सुपरवाइजरी बोर्ड ने सर्वसम्मति से ‘Future Plan 2030’ को मंजूरी दी, जिसके तहत करीब 1 लाख नौकरियां खत्म की जाएंगी और कंपनी अपनी कारों की मॉडल रेंज को लगभग आधा कर देगी।
बढ़ती लागत, इलेक्ट्रिक वाहनों की प्रतिस्पर्धा और मुनाफे के दबाव से निपटने के लिए उठाया गया यह कदम फॉक्सवैगन के बिजनेस मॉडल और वैश्विक वर्कफोर्स दोनों में बड़े बदलाव की शुरुआत माना जा रहा है।
फॉक्सवैगन ग्रुप का कहना है कि वह पिछले दो सालों में पहले से तय लगभग 50,000 नौकरियों के अलावा 50,000 और नौकरियां खत्म करेगा। कंपनी ने अपनी हालिया प्रेस रिलीज में इस प्लान को “Volkswagen ग्रुप के इतिहास में सबसे अहम रणनीतिक बदलाव वाला प्रोग्राम” बताया है। इसमें जर्मनी के चार प्लांट में गाड़ियों का प्रोडक्शन बंद करना भी शामिल है।
ऑटोमेकर की हालिया फाइनेंशियल रिपोर्ट से यह भी पता चला है कि जर्मनी में उसकी वर्कफोर्स 2023 में 275,000 से घटकर 30 जून, 2026 तक 254,000 रह गई। वहीं, उसकी 2025 की सालाना रिपोर्ट में बताया गया कि फॉक्सवैगन ग्रुप ने फाइनेंशियल ईयर 2025 में औसतन 667,164 लोगों को रोजगार दिया, जो 2.3% की कमी है।
CEO ओलिवर ब्लूम ने आगे कहा कि कंपनी आने वाले सालों में अपने मशहूर ब्रांड्स को “और आकर्षक, मजबूत और ज्यादा कॉम्पिटिटिव” बनाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश करने की योजना बना रही है।
कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक, इस ऑटोमेकर ग्रुप में पांच यूरोपीय देशों के 10 ब्रांड शामिल हैं: वोक्सवैगन, वोक्सवैगन ऑटोमोबाइल्स, स्कोडा, सीट, कपरा, ऑडी, लेम्बोर्गिनी, बेंटले, पोर्श और डुकाटी। इसके अलावा, यह फाइनेंशियल सर्विस समेत कई अन्य ब्रांड और बिजनेस यूनिट भी चलाती है।
‘फ्यूचर प्लान 2030’ के साथ क्यों आगे बढ़ रही है Volkswagen?
फॉक्सवैगन का ‘फ्यूचर प्लान’ कई मुश्किलों का जवाब लगता है, जिनमें US के इंपोर्ट टैरिफ, कमजोर चीनी बाजार और एशियाई देश से कम कीमत वाले कॉम्पिटिशन का बढ़ना शामिल है। कंपनी के आधिकारिक नोट में बताया गया है कि ऑटोमोटिव इंडस्ट्री में बढ़ती ग्लोबल कॉम्पिटिशन, बदलती डिमांड और टेक्नोलॉजी में बदलाव को देखते हुए कंपनी अपने वर्कफोर्स स्ट्रक्चर में बदलाव कर रही है।
एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन में बिक्री में भारी गिरावट के कारण VW की टैक्स के बाद की कमाई में साल की पहली छमाही में 30% की गिरावट आई है, जबकि पहले चीन जर्मन कार बनाने वाली कंपनियों के लिए सबसे बड़ा विदेशी बाजार हुआ करता था।
हालांकि, फॉक्सवैगन ग्रुप की मुश्किलें अकेली नहीं हैं, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ नियमों और इलेक्ट्रिक व हाइब्रिड गाड़ियों के बढ़ते चलन के बीच आम तौर पर जर्मन कार बनाने वाली कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है। अमेरिका में बड़ा मैन्युफैक्चरिंग बेस न होने के कारण फॉक्सवैगन पर इन बदलावों का सबसे ज़्यादा असर पड़ा है।
हाल ही में, कंपनी के CEO ओलिवर ब्लूम ने कर्मचारियों से कहा, “टैरिफ, नए कॉम्पिटिटर और जियोपॉलिटिकल रिस्क: पूरी ऑटोमोटिव इंडस्ट्री भारी दबाव में है।”
एसोसिएटेड प्रेस की इस हफ़्ते की शुरुआत की रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी बाजारों में चीनी इंपोर्ट में बढ़ोतरी जर्मनी की इकॉनमिक सुस्ती का एक बड़ा कारण रही है, जो कोविड-19 महामारी के बाद से देखी जा रही है।
AP के मुताबिक, फॉक्सवैगन के फाइनेंस चीफ, अर्नो एंटलिट्ज़ ने भी कहा कि लागत कम करनी होगी, “ऐसे माहौल में जहां चीन का कुल बाज़ार 20% नीचे है, और चीनी कॉम्पिटिटर एक्सपोर्ट बढ़ा रहे हैं और इस तरह यूरोप में कॉम्पिटिशन का दबाव बढ़ा रहे हैं।”
फॉक्सवैगन की पुनर्गठन योजना से प्राप्त निष्कर्ष
वॉल स्ट्रीट जर्नल द्वारा फॉक्सवैगन के आंकड़ों के विश्लेषण के अनुसार, कंपनी अपने प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में प्रति कार उत्पादन में अधिक श्रमिकों को रोजगार दे रही है और समूह लगभग 150 वाहन मॉडल बनाता है, जिनमें ऑडी, पोर्श और अन्य ब्रांड शामिल हैं जिन्हें उसने वर्षों से अधिग्रहित किया है।
यही कारण है कि सीईओ ब्लूम ने नौकरियों में कटौती करने की व्यापक सुधार योजना प्रस्तुत की, साथ ही अन्य बड़े फैसले भी लिए जो कंपनी का मानना है कि भविष्य में उसकी प्रगति के लिए अब महत्वपूर्ण हैं।
‘फ्यूचर प्लान 2030’ के तहत, फॉक्सवैगन ग्रुप ने घोषणा की है कि उसकी अतिरिक्त 50,000 नौकरियों में कटौती में प्रबंधन पदों को भी समाप्त करना शामिल होगा।
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