ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता और घबराहट एक बार फिर बढ़ गई है। ऐसे माहौल में निवेशक शेयर बाजार से पैसा निकालकर सेफ हेवन एसेट्स की ओर रुख कर रहे हैं। सोना और चांदी को हमेशा से संकट के समय सुरक्षित निवेश माना जाता है। लेकिन सवाल यह है कि मौजूदा हालात में सोना या चांदी में से किस पर ज्यादा भरोसा किया जाए। निवेश के लिए गोल्ड ईटीएफ बेहतर रहेगा या सिल्वर ईटीएफ?
बढ़ता जियो-पोलिटिकल टेंशन
जब भी दुनिया में युद्ध या बड़े टकराव की आशंका बढ़ती है, निवेशक अपनी पूंजी को सुरक्षित रखने पर ज्यादा गौर करते हैं। अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमले ने कुछ ऐसे ही हालात पैदा कर दिए हैं। शेयरों की तुलना में सोना और चांदी जैसे प्रेशियस मेटल कम रिस्क वाले निवेश माने जाते हैं। हालांकि दोनों की प्रकृति अलग है। सोना शुद्ध रूप से सेफ हेवन इनवेस्टमेंट यानी सुरक्षित निवेश माना जाता है, जबकि चांदी पर इंडस्ट्रियल डिमांड का असर भी पड़ता है। इसलिए संकट के समय सोने में ज्यादा तेजी दिखती है, जबकि चांदी में उतार-चढ़ाव अधिक देखा जाता है।
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डॉलर और ब्याज दरों का असर
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) से दुनिया का 20 प्रतिशत से ज्यादा क्रूड ऑयल गुजरता है। इस इलाके में मिसाइल हमलों से सप्लाई में दिक्कत बढ़ने का डर पैदा हुआ है और तेल की कीमतों में उछाल आया है। तेल महंगा होने से इंफ्लेशन बढ़ने की आशंका रहती है, जो आम तौर पर सोने की कीमतों के लिए पॉजिटिव सिग्नल माना जाता है।
इसके साथ ही सोने की कीमतों पर अमेरिकी डॉलर और ब्याज दरों का भी काफी असर पड़ता है। डॉलर मजबूत होता है तो सोने पर दबाव पड़ता है। वहीं, ब्याज दरें बढ़ने पर भी इसकी तरफ निवेशकों का रुझान घट सकता है। इन फैक्टर्स का असर चांदी पर भी होता है, लेकिन उसकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों से ज्यादा जुड़ी रहती हैं क्योंकि सिल्वर का इस्तेमाल इंडस्ट्री में भी होता है।
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क्या हैं पिछले आंकड़े
इस साल की शुरुआत में सोने-चांदी दोनों में रिकॉर्ड तेजी दिखाई दी। अमेरिकी टैरिफ से जुड़ी अस्थिरता और दूसरी अंतरराष्ट्रीय चिंताओं के बीच निवेशकों ने जमकर खरीदारी की। हालांकि बाद में इसमें कुछ करेक्शन भी देखने को मिला। पिछले एक साल में गोल्ड ईटीएफ ने औसतन 83.39 प्रतिशत का रिटर्न दिया है, जबकि सिल्वर ईटीएफ का औसत रिटर्न 175.38 प्रतिशत रहा है। लेकिन शॉर्ट टर्म आंकड़े अलग तस्वीर दिखाते हैं। पिछले एक महीने में गोल्ड ईटीएफ का औसत रिटर्न माइनस 0.50 प्रतिशत रहा, जबकि सिल्वर ईटीएफ में औसतन 23.43 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इससे साफ संकेत मिलता है कि चांदी में उतार-चढ़ाव ज्यादा रहा है।
आने वाले दिनों का संकेत
आने वाले समय में हालात तेजी से बदल सकते हैं। आमतौर पर चांदी का मार्केट साइज गोल्ड की तुलना में छोटा होता है और इस पर सट्टेबाजी का असर ज्यादा रहता है। इसलिए सिल्वर प्राइस में अचानक गिरावट या तेजी, दोनों के आसार रहते हैं। वहीं, सोना तुलनात्मक रूप से ज्यादा स्टेबल माना जाता है और अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल के दौर में इसका रिस्क-रिटर्न बैलेंस चांदी से बेहतर माना जाता है। इन फैक्टर्स को देखते हुए मौजूदा माहौल में सोने को चांदी से ज्यादा भरोसेमंद इनवेस्टमेंट ऑप्शन माना जा सकता है।
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पोर्टफोलियो में कितनी जगह दें
निवेशकों के लिए अपने कुल पोर्टफोलियो का 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा प्रेशियस मेटल्स में रखना एक संतुलित रणनीति मानी जा सकती है। लेकिन यह हिस्सा सिर्फ गोल्ड या सिर्फ सिल्वर में न डालें, बल्कि दोनों में संतुलन बनाकर निवेश करें। आम तौर पर पोर्टफोलियो की मजबूती के लिए सोने का हिस्सा ज्यादा और चांदी का हिस्सा अपेक्षाकृत कम रखना बेहतर माना जा सकता है। साथ ही लंबी अवधि यानी कम से कम 5 साल के नजरिए से निवेश करना बेहतर होता है, क्योंकि शॉर्ट टर्म में उथल-पुथल का रिस्क अधिक होता है। यह भी ध्यान में रखें कि सोना हो या चांदी, इनमें निवेश के साथ हाई रिस्क जुड़ा हुआ है। इसलिए कोई भी फैसला अपनी जोखिम उठाने की क्षमता को ध्यान में रखकर ही लेना चाहिए।
(डिस्क्लेमर : इस आर्टिकल का उद्देश्य सिर्फ जानकारी देना है, निवेश की सलाह देना नहीं। निवेश का कोई भी फैसला पूरी जानकारी हासिल करने के बाद और सेबी रजिस्टर्ड इनवेस्टमेंट एडवाइजर की सलाह लेकर ही करें।)
