अमेरिका-ईरान युद्ध का असर सिर्फ तेल कंपनियों तक ही सीमित नहीं है। बल्कि भारत के बासमती चावल बाजार पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है। समाचार एजेंसी PTI के अनुसार, पिछले 72 घंटों में इस प्रीमियम अनाज की कीमतों में 7-10% की गिरावट आई है। इसी वजह मिडिल ईस्ट (जो भारतीय बासमती के सबसे बड़े बाजारों में से एक है) को निर्यात बाधित हो गया है।

उद्योग से जुड़े लोग और उस पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना ​​है कि शिपमेंट में आई मंदी के कारण घरेलू बाजार में अधिक मात्रा में माल भेजा जा रहा है, जिससे अगर यह व्यवधान जारी रहता है तो कीमतों में और अधिक गिरावट आने की आशंका बढ़ रही है।

भारतीय बंदरगाहों पर फंसा हुआ है लाखों टन बासमती

निर्यातकों का कहना है कि लगभग 2 लाख टन बासमती चावल भारतीय बंदरगाहों पर फंसा हुआ है और लगभग 2 लाख टन चावल पारगमन में ही अटका हुआ है क्योंकि जहाज मिडिल ईस्ट के प्रमुख शिपिंग मार्गों से बच रहे हैं।

रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सतीश गोयल ने बताया कि निर्यातकों द्वारा खेप भेजने में हो रही दिक्कतों के चलते फिलहाल बंदरगाहों और परिवहन के दौरान लगभग 4 लाख टन बासमती चावल फंसा हुआ है।

क्रिसिल रेटिंग्स के अनुसार, पिछले वित्तीय वर्ष में भारत के लगभग 6 मिलियन टन बासमती चावल के निर्यात में से लगभग 70-72% हिस्सा मध्य पूर्व और अन्य पश्चिम एशियाई देशों को निर्यात किया गया था।

इन देशों में बासमती चावल को मुख्य भोजन माना जाता है, जिसकी मांग का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है। क्रिसिल ने कहा कि हाल के घटनाक्रमों से शिपमेंट में देरी हो सकती है और निकट भविष्य में बासमती चावल के व्यापार की मात्रा प्रभावित हो सकती है।

क्रिसिल ने कहा कि यदि संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है, तो इन क्षेत्रों में संबंधित पक्षों से भुगतान में देरी हो सकती है, जिससे निर्यातकों के लिए कार्यशील पूंजी चक्र लंबा हो सकता है। हालांकि, निर्यातकों की मजबूत बैलेंस शीट के कारण उनकी साख अच्छी बनी रहने की उम्मीद है।

माल ढुलाई की लागत हुई दोगुनी

प्रमुख मार्ग से जहाजों के बचने के कारण माल ढुलाई लागत दोगुनी हो गई है। यह व्यवधान अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमले के बाद संघर्ष में आई तेजी के कारण उत्पन्न हुआ है, जिससे खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है।

रॉयटर्स के अनुसार, मध्य पूर्व में व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाले जहाजों पर बीमा कंपनियों द्वारा बीमा वापस लेने के कारण असर पड़ा है। इस क्षेत्र में माल भेजने की दरें दोगुनी से भी अधिक हो गई हैं, जिससे कई व्यापारियों के लिए निर्यात अलाभकारी हो गया है।

निर्यातकों का कहना है कि उन्होंने चावल की बड़ी मात्रा बंदरगाहों तक पहुंचा दी है, लेकिन कंटेनर की बढ़ती लागत और आपूर्ति को खपाने के लिए वैकल्पिक बाजारों की कमी के कारण वे इसे भेज नहीं पा रहे हैं। परिणामस्वरूप, कई निर्यातकों ने मध्य पूर्वी खरीदारों से नए ऑर्डर लेना बंद कर दिया है और इसके बजाय मौजूदा अनुबंधों को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

फिलहाल काफी हद तक किसान सुरक्षित

फिलहाल, किसानों को कीमतों में गिरावट का तत्काल प्रभाव महसूस नहीं हो सकता है। निर्यातकों ने द इकोनॉमिक टाइम्स को बताया कि अधिकांश किसानों ने अपनी उपज पहले ही बेच दी है यानी नुकसान की भरपाई फिलहाल मुख्य रूप से व्यापारियों और निर्यातकों द्वारा की जा रही है जिनके पास स्टॉक मौजूद है।

फिर भी अगर निर्यात रुका रहता है और घरेलू आपूर्ति और बढ़ती है, तो आने वाले हफ्तों में कीमतों पर और दबाव पड़ सकता है। हालांकि, कुछ निर्यातकों का मानना ​​है कि यह मंदी अस्थायी ही हो सकती है। मुंबई के एक व्यापारी ने रॉयटर्स को बताया, “बासमती चावल मध्य पूर्व का मुख्य भोजन है और भारतीय आपूर्ति का कोई विकल्प नहीं है। युद्ध समाप्त होने के बाद, ये देश फिर से स्टॉक जमा करना शुरू कर देंगे।”

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