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नोटबंदी के बाद बेरोजगारी दर ने तोड़ा 45 साल का रिकॉर्ड, पहली बार सामने आया सरकारी आंकड़ा

देश में बेरोजगारी दर बेतहाशा बढ़ गई है। 2017-18 में यह दर 45 साल में सबसे ज्‍यादा रही। 6.1 प्रतिशत। बताया जा रहा है कि 1972-73 के बाद पहली बार बेरोजगारी दर इस लेवल पर गई है।

Author January 31, 2019 12:49 PM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव))

देश में बेरोजगारी दर बेतहाशा बढ़ गई है। 2017-18 में यह दर 45 साल में सबसे ज्‍यादा रही। 6.1 प्रतिशत। बताया जा रहा है कि 1972-73 के बाद पहली बार बेरोजगारी दर इस लेवल पर गई है। बता दें कि 1972-73 से पहले रोजगारी संबंधी आंकड़ेे जमा करने की व्‍यवस्‍था नहीं थी। बिजनेस स्‍टैण्‍डर्ड ने नेशनल सैम्‍पल सर्वे ऑफिस (NSSO) की ओर से किए गए पेरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के हवाले से 6.1 प्रतिशत बेरोजगारी दर होने की जानकारी दी है। यह जानकारी ऐसे समय सामने आई है जब बेरोजगारी के आंकड़े सार्वजनिक करने में देरी की वजह से राष्‍ट्रीय सांख्‍यिकीय आयोग के दो सदस्‍यों ने इस्‍तीफा दे दिया है।

बेरोजगारी को लेकर सामने आया यह किसी सरकारी एजेंसी द्वारा तैयार सबसे ताजा और नोटबंदी के बाद का पहला आंकड़ा है। हालांकि, आधिकारिक रूप से इसे जारी नहीं किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवंबर, 2016 को नोटबंदी की थी। जानकार कहते रहे हैं कि नोटबंदी का रोजगार पर काफी नकारात्‍मक असर हुआ है और इससे बेरोजगारी बढ़ी है। बेरोजगारी बढ़ने की एक वजह जीएसटी को लागू करने की खामियों को भी बताया जाता रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक शहरी इलाकों में बेरोजगारी ज्‍यादा बढ़ी है। शहरी इलाकों में इसकी दर 7.8 प्रतिशत बताई गई है, जबकि ग्रामीण इलाकों में 5.3 फीसदी। युवा बेरोजगारों की संख्‍या में भी काफी बढ़ोत्‍तरी दर्ज की गई है। युवाओं के बीच बेरोजगारी दर ने 2017-18 में नया रिकॉर्ड बनाया है।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण इलाकों की पढ़ी-लिखी महिलाओं की बेरोजगारी दर 2017-18 में 17.3 प्रतिशत रही। 2004-05 में यह 9.7 प्रतिशत थी, जो 2011-12 में 15.2 प्रतिशत हो गई थी। ग्रामीण इलाकों के पढ़े-लिखे पुरुषों के मामले में यह आंकड़ा 2017-18 में 10.5 प्रतिशत रहा, जबकि 2004-05 से 2011-12 के दौरान यह 3.5 से 4.4 प्रतिशत के बीच रहा था।

लएफपीआर यानी लेबर फोर्स पार्टिसिपेटिंंग (रोजगार में लगे हुए या लगने की इच्‍छा रखने वाले) रेट भी 2017.18 में 36.9 पर पहुंच गई है, जबकि 2011-12 में यह 39.5 फीसदी थी। यानी चाहते हुए भी लोगों को रोजगार नहीं मिल रहा है। बता दें कि युवाओं को रोजगार देना 2014 में नरेंद्र मोदी के सबसे बड़े चुनावी वादों में से एक था। अब 2019 चुनाव में कांग्रेस जहां बीजेपी की वादाखिलाफी को मुद्दा बना रही है, वहीं खुद उसी वादे के साथ जंग में उतर रही है। कांग्रेस का कहना है कि वह 2019 से 2024 के दौरान सात करोड़ रोजगार के अवसर पैदा कर सकती है और राजीव गांधी इंस्‍टीट्यूट ऑफ कन्‍टेम्‍पररी स्‍टडीज ने एक रिपोर्ट में इसका खाका भी पेश किया है। यह रिपोर्ट कांग्रेस को सौंपी गई है।

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