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बिहार में पूरे देश के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ रही है बेरोजगारी, चुनाव में भी अहम हो सकता है यह मुद्दा

फिलहाल राज्य में बेरोजगारी की दर तेजी से कम होते हुए 12 फीसदी ही रह गई है, लेकिन राष्ट्रीय औसत के मुकाबले अब भी यह करीब दोगुनी दर है। देश भर में फिलहाल बेरोजगारी की दर 6.7 फीसदी है।

nitish kumarबिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

चुनावी राज्य बिहार में बेरोजगारी का मुद्दा इन दिनों खूब छाया हुआ है और प्रदेश सरकार पर निशाना साधने के लिए विपक्षी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। इस बीच सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी के डाटा में भी राज्य में बेरोजगारी बढ़ने की तस्दीक की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक सूबे में बेरोजगारी का औसत बढ़ रहा है और यह राष्ट्रीय औसत के मुकाबले कहीं ज्यादा है। CMIE ने अपने साप्ताहिक विश्लेषण में कहा है, ‘लॉकडाउन के दौरान उन राज्यों में से एक है, जो बेरोजगारी से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। यह बेहद आश्चर्यजनक है क्योंकि यह राज्य काफी गरीब है और यहां लोग बेरोजगारी की स्थिति को ज्यादा दिनों तक वहन करने की स्थिति में नहीं हैं।’

रिपोर्ट में कहा गया है कि बेहद गरीब राज्य में बेरोजगारी दर का भी ऊंचा सूबे के लोगों के लिए दोहरे झटके की तरह है। कड़े लॉकडाउन ने बिहार के लोगों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। CMIE डाटा के मुताबिक राज्य में अप्रैल और मई के दौरान बेरोजगारी का औसत 46 फीसदी का था, जबकि पूरे देश में इस दौर में बेरोजगारी का औसत 24 फीसदी ही था। फिलहाल राज्य में बेरोजगारी की दर तेजी से कम होते हुए 12 फीसदी ही रह गई है, लेकिन राष्ट्रीय औसत के मुकाबले अब भी यह करीब दोगुनी दर है। देश भर में फिलहाल बेरोजगारी की दर 6.7 फीसदी है।

CMIE की रिपोर्ट में कह गया है कि बिहार में बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है। सबसे महत्वपूर्ण है कि यह दर भारत के मुकाबले ज्यादा अधिक है। हालात 2018 के मुकाबले ज्यादा कठिन हो गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2016 और 2017 में बिहार में बेरोजगारी की दर राष्ट्रीय औसत के मुकाबले कम थी। लेकिन 2018 के बाद से यह राष्ट्रीय औसत से अधिक है और बीते दो सालों में इसमें तेजी से इजाफा हुआ है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि बेरोजगारी में इजाफा होना ऐसे समाज के लिए बड़ी समस्या है, जहां पहले से ही यह स्थिति रही हो। रिपोर्ट के मुताबिक यह ऐसा मुद्दा है, जिस पर राज्य सरकार को फोकस किए जाने की जरूरत है। यही नहीं चुनावी राजनीति का जिक्र करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थायी नौकरियों के वादे ने अभ्यर्थियों के सपनों को जिंदा करने का काम किया है। इसका अर्थ है कि विपक्षी दलों की ओर से सरकारी नौकरियां देने का वादा करने का असर चुनाव में दिख सकता है।

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