अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को कुछ ब्रांडेड दवाओं के आयात पर 100% टैरिफ लगाने का आदेश दिया। जबकि जेनेरिक दवाओं को इससे बाहर रखा गया है।

यह एक ऐसा कदम है जिससे भारत काफी हद तक सुरक्षित रहेगा, क्योंकि अमेरिका को कम कीमत वाली जेनेरिक दवाओं के निर्यात में भारत का दबदबा है।

ट्रंप का यह फैसला ऐसे समय आया है जब ठीक एक साल पहले घोषित किए गए व्यापक ग्लोबल टैरिफ प्लान के कमजोर पड़ने के बाद अमेरिकी प्रशासन नई व्यापार नीति को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

इन कंपनियों को मिल सकती है छूट

GTRI की रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त और सितंबर 2026 के बीच इन टैरिफ के शुरू होने की उम्मीद है, जिसके पहले 120–180 दिनों का एक ट्रांज़िशन पीरियड (बदलाव का समय) होगा। जो कंपनियां कीमतें कम करती हैं या अपना उत्पादन अमेरिका में शिफ्ट कर लेती हैं, उन्हें 10–20% का कम टैरिफ देना पड़ सकता है या उन्हें छूट मिल सकती है। जो दोनों में से कुछ भी नहीं करते हैं, उन्हें 100% ड्यूटी का सामना करना पड़ेगा।

2 अप्रैल, 2026 को जारी यह आदेश 1 मई, 2025 को शुरू की गई ‘सेक्शन 232’ की जांच पर आधारित है, जिसमें विदेशी दवा सप्लाई पर निर्भरता से होने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिमों का ज़िक्र किया गया था।

इस आदेश का समय वॉशिंगटन की आक्रामक व्यापार रणनीति के जारी रहने का संकेत देता है।

किन देशों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?

GTRI की रिपोर्ट के अनुसार, इन टैरिफ का मुख्य असर आयरलैंड, जर्मनी, स्विट्ज़रलैंड, बेल्जियम, डेनमार्क, यूनाइटेड किंगडम और जापान पर पड़ेगा; ये देश अमेरिका को पेटेंट वाली और ज्यादा कीमत वाली दवाएं (जिनमें बायोलॉजिक्स भी शामिल हैं) निर्यात करने वाले प्रमुख देश हैं।

यह आदेश उन देशों को भी छूट नहीं देता जिनके अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते हैं, जिनमें यूरोपीय संघ और जापान शामिल हैं। इसके बजाय, कोई भी राहत देश के दर्जे पर नहीं, बल्कि कंपनी के स्तर पर नियमों के पालन (कम्प्लायंस) पर निर्भर करेगी।

जेनेरिक दवाएं (जो अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली कुल दवाओं का 90% से ज़्यादा हिस्सा हैं) फिलहाल इस टैरिफ से बाहर रखी गई हैं; यह छूट शायद लगभग एक साल तक जारी रहेगी, ताकि दवाओं की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी को रोका जा सके।

इस फैसले का भारत पर कितना असर?

इसका भारत के लिए तत्काल असर सीमित है। अमेरिका को भारत से होने वाले दवा निर्यात का लगभग 90% हिस्सा जेनेरिक दवाओं का है, जो इस टैरिफ से बाहर हैं। भारत ने वर्ष 2025 में अमेरिका को 9.7 अरब डॉलर की दवाएं निर्यात कीं, जो उसके कुल वैश्विक दवा निर्यात (25.8 अरब डॉलर) का 38% हिस्सा था।

हालांकि, जो भारतीय कंपनियां ब्रांडेड या खास तरह की दवाएं बनाती हैं या पेटेंट वाली दवाओं के लिए कच्चा माल (इनपुट) सप्लाई करती हैं, उन्हें टैरिफ के दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

अमेरिका की रणनीति

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका टैरिफ का उपयोग मुख्य रूप से दबाव बनाने के हथियार के तौर पर कर रहा है, न कि राजस्व बढ़ाने के लिए कर रहा है। इसका मकसद दवा बनाने वाली कंपनियों पर दबाव डालकर अमेरिका में दवाओं की कीमतें कम करवाना, कुछ उत्पादन स्थानीय स्तर पर करवाना और दवाओं की सप्लाई चेन पर ज़्यादा नियंत्रण हासिल करना है।

इस क्षेत्र को सेमीकंडक्टर की तरह ही रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ये टैरिफ इस तरह से बनाए गए हैं कि इनसे बचा जा सके जो कंपनियां कीमतें कम करती हैं या अमेरिका में उत्पादन में निवेश करती हैं, वे इनसे बच सकती हैं।

बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों, खासकर यूरोप और आयरलैंड की कंपनियों से उम्मीद है कि वे इस पर व्यावहारिक प्रतिक्रिया देंगी। कई कंपनियां वैश्विक स्तर पर कीमतों में भारी कटौती करने के बजाय, कीमतों में थोड़ी कटौती या अमेरिका में चुनिंदा निवेश की पेशकश करके कम टैरिफ दरों के लिए बातचीत कर सकती हैं।

कुछ कंपनियां छूट पाने के लिए अमेरिका में उत्पादन के अंतिम चरण या पैकेजिंग का विस्तार कर सकती हैं, जबकि मुख्य उत्पादन यूरोप में ही रखेंगी।

मेटल्स टैरिफ की घोषणा

रायटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, इसके अलावा, ट्रंप ने मेटल्स टैरिफ की भी घोषणा की, जिसमें स्टील, एल्युमिनियम और कॉपर से बने कई डेरिवेटिव प्रोडक्ट्स पर ड्यूटी रेट को आधा करके 25% कर दिया गया और कम से कम मेटल कंटेंट वाले प्रोडक्ट्स पर इसे पूरी तरह से हटा दिया गया।

इस कदम से स्टील, एल्युमीनियम और तांबे जैसी वस्तुओं के आयात पर 50% शुल्क यथावत बना रहा। लेकिन अधिकारी के अनुसार, ट्रंप प्रशासन अब इस दर को धातुओं के घोषित आयात मूल्य पर नहीं, बल्कि अमेरिका में विक्रय मूल्य पर लागू करेगा। अधिकारी ने कहा कि आयात मूल्य को अक्सर आर्टिफिशियल रूप से कम रखा जाता था।

मेटल्स में बदलाव का मकसद एक बहुत ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड टैरिफ सिस्टम को आसान बनाना है। जिन प्रोडक्ट्स में वजन के हिसाब से 15% से कम मेटल कंटेंट होता है, जैसे कि एक डेंटल फ्लॉस कंटेनर जिसमें एक छोटा स्टील कटर ब्लेड होता है, उन पर अब ये टैरिफ नहीं लगेंगे।

व्हाइट हाउस ने यह भी कहा कि वह 2027 तक कुछ मेटल-इंटेंसिव इंडस्ट्रियल और पावर-ग्रिड इक्विपमेंट पर ड्यूटी 50% से घटाकर 15% कर देगा ताकि बड़े पैमाने पर इंडस्ट्रियल और डेटा-सेंटर बनाने में मदद मिल सके। ऑर्डर में कहा गया है कि मेटल टैरिफ में बदलाव सोमवार आधी रात के ठीक बाद लागू होगा।

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