ताज़ा खबर
 

तंबाकू और तकलीफ

गुटखा, सिगरेट आदि जैसे तंबाकू उत्पादों का सेवन सेहत के लिए कितना नुकसानदेह है, यह छिपा नहीं है। समय-समय पर इसे लेकर चेतावनी भी जारी की जाती रही है। मगर न लोग अपने स्तर पर इनके सेवन की आदत छोड़ने का प्रयास करते हैं, न सरकारें इन पर लगाम लगाने के लिए कोई सख्त कदम […]

Author December 20, 2014 3:00 AM

गुटखा, सिगरेट आदि जैसे तंबाकू उत्पादों का सेवन सेहत के लिए कितना नुकसानदेह है, यह छिपा नहीं है। समय-समय पर इसे लेकर चेतावनी भी जारी की जाती रही है। मगर न लोग अपने स्तर पर इनके सेवन की आदत छोड़ने का प्रयास करते हैं, न सरकारें इन पर लगाम लगाने के लिए कोई सख्त कदम उठाती हैं। शायद यही वजह है कि अब तक देश भर में इनकी खरीद-बिक्री पर पूरी तरह रोक लगाना संभव नहीं हो पाया है।

कुछ राज्य सरकारों ने इसके व्यापक नुकसान के मद्देनजर गुटखे की बिक्री पर कानूनी पाबंदी लगाई है। यों, इन उत्पादों के खरीदने या बेचने पर प्रतिबंध लगाना इस समस्या का समाधान नहीं है। पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से भारत के सात राज्यों में किए गए ताजा अध्ययन रिपोर्ट से पता चलता है कि अगर तात्कालिक उपाय के तौर पर पाबंदी लगाई जाए, तो काफी हद तक सकारात्मक नतीजे हासिल किए जा सकते हैं। असम, बिहार, गुजरात, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, ओड़िशा और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हुए इस अध्ययन के मुताबिक राज्यस्तर पर कानूनी रोक के बाद आदतन गुटखे का सेवन करने वालों की तादाद में भारी कमी दर्ज की गई।

हालांकि बाजार में आसानी से गुटखे की उपलब्धता न होने के चलते जहां कुछ लोग इससे दूर होते गए, वहीं नागरिक स्वास्थ्य महकमों के सामने एक नई चुनौती यह खड़ी हुई कि कुछ लोग गुटखा न मिल पाने पर इसके विकल्प के तौर पर अलग से तंबाकू खरीद और पान मसाले के साथ मिला कर उसका सेवन करने लगे। गुटखा बनाने वाले भी अलग से तंबाकू का पैकेट बनाने लगे। इस अध्ययन के नतीजों ने संबंधित सरकारी महकमों के लिए दो अहम संदेश छोड़े हैं। पहला, गुटखे पर प्रतिबंध से इसकी खपत में आई भारी कमी को देखते हुए इस कानून को और प्रभावकारी तरीके से लागू किया जाना चाहिए और दूसरा कि खुले तंबाकू को पान मसाले के साथ मिला कर गुटखे की तरह सेवन करने की आदतों को रोकने के लिए कोई रास्ता निकाला जाए।

तंबाकू के सेवन से सेहत पर पड़ने वाले घातक प्रभाव को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे सदी की सबसे बड़ी बीमारी करार दिया है। कई वैज्ञानिक अध्ययनों में यह तथ्य सामने आ चुका है कि गैर-संक्रामक रोगों का सबसे बड़ा कारण तंबाकू का सेवन है। विशेषज्ञों के मुताबिक गुटखा, खैनी और अन्य चबाए जाने वाले तंबाकू उत्पाद खासकर मुंह के कैंसर के लिए जिम्मेदार हैं। इसके अलावा, इनसे गले और सांस की नली का कैंसर भी हो सकता है। लेकिन विडंबना है कि तंबाकू उत्पादों के खतरों के बारे में ज्यादातर लोगों को पता होने के बावजूद वे इन्हें छोड़ने का प्रयास नहीं करते। सभी जानते हैं कि ऐसी आदतें इन उत्पादों का सेवन करने वालों के संपर्क में आने और शौक के चलते शुरू होती हैं और बाद में मजबूरी बन जाती हैं। लेकिन यह समस्या जितनी समाज में पैदा होती है, उतनी ही इसके लिए सरकार भी जिम्मेदार है। जब सरकार को पता है कि ये उत्पाद लोगों की सेहत के लिए खतरनाक होते हैं, तो ये खरीदे या बेचे जाने के लिए बाजार में खुले तौर पर कैसे उपलब्ध रहते हैं? साफ है कि पाबंदी एक सीमा में बेहतर उपाय जरूर है, लेकिन तंबाकू उत्पादों से पैदा होने वाले खतरों से निपटने के लिए इनके उत्पादन पर भी रोक होनी चाहिए।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App