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ज्यादा आक्रामक नहीं होगी कर नीति: अरूण जेटली

नई दिल्ली। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने देश को कम लागत का निर्माण केंद्र बनाने के लिए उचित और तर्कसंगत कर नीति का वादा किया है। उन्होंने रविवार को कहा कि कर नीति करदाताओं के साथ अधिक आक्रामक नहीं होगी। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करेगी, बेशक इस मुद्दे […]

Author Updated: November 10, 2014 10:57 AM

नई दिल्ली। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने देश को कम लागत का निर्माण केंद्र बनाने के लिए उचित और तर्कसंगत कर नीति का वादा किया है। उन्होंने रविवार को कहा कि कर नीति करदाताओं के साथ अधिक आक्रामक नहीं होगी। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करेगी, बेशक इस मुद्दे पर उसे विपक्ष का सहयोग न मिले। उन्होंने कहा कि सरकार का इरादा अर्थव्यवस्था में भरोसा कायम करने का है।

जेटली ने रविवार को यहां भारत वैश्विक मंच की बैठक को संबोधित करते हुए उम्मीद जताई कि लंबे समय से अटका बीमा कानून संशोधन विधेयक संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में पारित हो जाएगा। इसमें बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) की सीमा 26 से बढ़ाकर 49 फीसद करने का प्रावधान है। वित्त मंत्री ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष चुनौतियां हैं। ऐसे में एक उचित और तर्कसंगत कर नीति की जरूरत है। यह करदाताओं के साथ बहुत अधिक आक्रामक नहीं हो सकती। उन्होंने इस बात का उल्लेख किया कि भारत ऊंचे कर वाला देश नहीं है। वित्त मंत्री ने कहा कि कर विभाग उस सिद्धांत का पालन कर रहा है जिसमें जिनको कर देना है, वे कर जरूर अदा करें और जिन पर कर नहीं बनता उन्हें भुगतान करने के लिए परेशान न किया जाए।

जेटली ने कहा,‘हमें यह बात समझ में आई है कि निर्माण क्षेत्र हमारे समक्ष बड़ी चुनौतियों में से एक है। हमें अंतत: भारत को एक कम लागत वाला निर्माण केंद्र बनाना है।’ भूमि अधिग्रहण कानून के सवाल पर जेटली ने कहा,‘इस कानून में कुछ बदलाव जरूरी है। पहले हम सहमति बनाने का प्रयास करेंगे। यदि यह संभव नहीं होता है, तो भी हम आगे बढ़ेंगे और फैसला लेंगे।’ भूमि अधिग्रहण कानून पूर्ववर्ती संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के कार्यकाल में पारित किया था। विपक्षी भाजपा ने उस समय इसका समर्थन किया था। इसका मकसद औद्योगिक परियोजनाओं के लिए ली जाने वाली किसानों की भूमि के लिए उचित मुआवजा देना है। लेकिन इस कानून की वजह से भूमि अधिग्रहण काफी मुश्किल हो गया है, जिससे परियोजनाओं की रफ्तार घट गई है। जेटली ने कहा कि भारत में स्मार्ट सिटी की धारणा को क्रियान्वित करने के लिए सर्वप्रथम जमीन अधिग्रहण कानून में बाधाओं को दूर किया जाएगा।

वित्त मंत्री ने कहा कि देश में स्मार्ट शहरों के विकास की अवधारणा को मूर्त रूप देने के लिए भी भूमि संबंधी कानूनों के कारण पैदा अड़चने दूर करनी होंगी। ग्रामीण विकास मंत्रालय पहले ही जमीन अधिग्रहण कानून में कई संशोधनों का सुझाव दे चुका है जिससे सार्वजनिक-निजी भागीदारी वाली परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण को लेकर कम-से-कम 70 फीसद स्थानीय लोगों की सहमति और निजी परियोजनाओं के लिए 80 फीसद लोगों की सहमति जैसे प्रावधान हल्के होंगे। जेटली ने यह भी कहा कि सरकार का विनिवेश कार्यक्रम अगले कुछ दिन में सामने आएगा। उन्होंने कहा कि सरकार का इरादा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 52 फीसद पर लाने का है।

वित्त मंत्री ने कहा अर्थव्यवस्था चुनौतीपूर्ण स्थिति में थी और अभी भी है। हमारे समक्ष प्रमुख चुनौती भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति भरोसा कायम करने की है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को विस्तार दिया जा सके और वृद्धि दर को बढ़ाया जा सके। उन्होंने कहा कि अगले साल वृद्धि दर कुछ बेहतर रहेगी। यदि यही रुख जारी रहता है, तो भारत जल्द ऊंची वृद्धि की राह पर लौट सकता है। सुधारों का बात करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि कुछ सुधारों पर सहमति संभव है जबकि कुछ अन्य अधिक चुनौतीपूर्ण हैं। उन्होंने कहा, ‘मेरा हमेशा से मानना रहा है कि कुछ सुधार आसानी से संभव हैं। मैंने स्पष्ट रूप से उन्हें प्राथमिकता दी है।’ जेटली ने संकेत दिया कि वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) पर संशोधनों को संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में पेश किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार की इस मुद्दे पर राज्यों के साथ बातचीत अंतिम चरण में है। संसद का एक महीने का शीतकालीन सत्र 24 नवंबर से शुरू हो रहा है। वस्तु और सेवा कर लागू होने के बाद केंद्र के साथ राज्यों के स्तर पर ज्यादातर अप्रत्यक्ष कर समाप्त हो जाएंगे।

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने 2011 में जीएसटी को पेश करने के लिए लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पेश किया था। राज्यों के बीच सहमति के अभाव में जीएसटी के कार्यान्वयन की कई समय सीमाएं बीत चुकी हैं। केंद्र और राज्यों के बीच केंद्रीय बिक्रीकर (सीएसटी) के मुआवजा बकाए का मुद्दा विवाद का विषय है। राज्यों को 2010 से लंबित 13 हजार करोड़ रुपए का बकाया अभी तक नहीं मिला है।

 

 

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