Tax Saving Investment Planning : टैक्स सेविंग इनवेस्टमेंट की बात होने पर निवेशकों के मन में एंप्लाईज प्रॉविडेंट फंड (EPF), यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (ULIP), और इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम (ELSS) जैसे पॉपुलर ऑप्शन्स का ध्यान जरूर आता है। लेकिन इन प्रोडक्ट्स से जुड़े टैक्स नियमों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई बदलाव हुए हैं। न्यू टैक्स रिजीम आने के कारण भी टैक्स सेविंग इनवेस्टमेंट का मतलब और महत्व बदल गया है। ऐसे में निवेश से जुड़े फैसले करने से पहले इनवेस्टमेंट के अलग-अलग ऑप्शन्स से जुड़े टैक्सेशन के नए नियमों को समझना जरूरी है.

ULIP पर टैक्सेशन के मौजूदा नियम

लंबे समय तक ULIP को टैक्स के लिहाज से सबसे ज्यादा फायदा देने वाला प्रोडक्ट माना जाता था। प्रीमियम पर सेक्शन 80C के तहत टैक्स छूट मिलती थी और मैच्योरिटी पर मिलने वाला पैसा पूरी तरह टैक्स फ्री होता था। लेकिन 1 फरवरी 2021 के बाद जारी होने वाली पॉलिसियों के लिए नियम बदल गए। अब अगर किसी व्यक्ति के सभी ULIP का सालाना प्रीमियम मिलाकर अगर 2.5 लाख रुपये से ज्यादा हो गया, तो मैच्योरिटी रकम टैक्स फ्री नहीं रहेगी। राहत की बात यह है कि डेथ बेनिफिट अब भी पूरी तरह टैक्स फ्री है, चाहे प्रीमियम कितना भी हो।

ओल्ड टैक्स रिजीम चुनने वाले निवेशकों को प्रीमियम पर 80C की छूट मिलती है, लेकिन अगर पॉलिसी पांच साल से पहले बंद की गई तो पहले ली गई टैक्स छूट फिर से टैक्सेबल हो जाती है। न्यू रिजीम में यह छूट लागू नहीं है।

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EPF पर नए नियमों और न्यू टैक्स रिजीम का असर

EPF में जमा पैसों को रिटायरमेंट प्लानिंग का सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद हिस्सा माना जाता है। यहां सबसे अहम नियम यह है कि अगर लगातार पांच साल की नौकरी के बाद पैसा निकाला जाए तो पूरी रकम टैक्स फ्री रहती है। लेकिन अगर किसी वजह से पांच साल से पहले निकासी होती है तो वह रकम टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्सेबल होती है।

2021 में एक और बदलाव हुआ। अगर किसी कर्मचारी का खुद का कंट्रीब्यूशन एक साल में 2.5 लाख रुपये से ज्यादा है, तो अतिरिक्त हिस्से पर मिलने वाला ब्याज टैक्स के दायरे में आ जाता है। इसका मकसद EPF को हाई इनकम वालों के लिए टैक्स बचाने का जरिया बनने से रोकना है।

न्यू टैक्स रिजीम लागू होने के बाद सबसे बड़ा बदलाव यह है कि कर्मचारियों के EPF कंट्रीब्यूशन पर अब 80C की छूट नहीं मिलती है। हालांकि EPF में एंप्लॉयर का कंट्रीब्यूशन तय सीमा तक टैक्स फ्री रहता है और 5 साल बाद पैसे निकालने पर भी टैक्स नहीं लगता। इस वजह से EPF अब भी लंबी अवधि के लिए रिटायरमेंट प्लानिंग का अच्छा ऑप्शन बना हुआ है, भले ही टैक्स छूट थोड़ी कम हो गई हो।

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ELSS और इक्विटी म्यूचुअल फंड 

जो म्यूचुअल फंड 65 फीसदी से ज्यादा निवेश इक्विटी में करते हैं, उन्हें इक्विटी म्यूचुअल फंड कहा जाता है। इन्हें एक साल से ज्यादा समय तक होल्ड करने पर एक वित्त वर्ष में 1.25 लाख रुपये तक का मुनाफा टैक्स फ्री रहता है, जबकि उससे ज्यादा मुनाफे पर 12.5 फीसदी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स लगता है। एक साल से कम समय में बेचने पर 20 फीसदी टैक्स देना पड़ता है।

ELSS भी इक्विटी फंड की कैटेगरी में ही आते हैं, लेकिन इनमें 3 साल का लॉक-इन होता है और एक साल में 1.5 लाख रुपये तक के निवेश पर 80C के तहत टैक्स छूट मिलती है। ELSS से होने वाले मुनाफे पर भी टैक्स के वही नियम लागू होते हैं जो बाकी इक्विटी म्यूचुअल फंड के लिए लागू हैं।

डेट म्यूचुअल फंड के मामले में तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। 1 अप्रैल 2023 के बाद खरीदे गए डेट फंड यूनिट्स पर मिलने वाला मुनाफा अब होल्डिंग पीरियड चाहे जितना हो, सीधे इनकम टैक्स के स्लैब के हिसाब से टैक्सेबल होता है। 

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निवेश से पहले बरतें सावधानी

कुल मिलाकर नए वित्त वर्ष के लिए निवेश की प्लानिंग करते समय नियमों की लेटेस्ट जानकारी होना जरूरी है। हर इनवेस्टमेंट प्रोडक्ट से जुड़े मौजूदा टैक्स नियमों समझकर निवेश करेंगे और उसी हिसाब से पोर्टफोलियो बनाएंगे तो टैक्स का बोझ कम पड़ेगा। ज्यादातर मामलों में इक्विटी आधारित प्रोडक्ट्स में लंबे समय के लिए निवेश करने पर टैक्स बेनिफिट ज्यादा मिल सकता है। लेकिन इक्विटी में निवेश के साथ मार्केट रिस्क जुड़ा रहता है, इसलिए पैसे लगाने से पहले अपनी रिस्क बर्दाश्त करने की क्षमता को जरूर ध्यान में रखें। 

(डिस्क्लेमर : इस आर्टिकल का उद्देश्य सिर्फ जानकारी देना है, निवेश की सलाह देना नहीं। निवेश का कोई भी फैसला पूरी जानकारी हासिल करने के बाद और सेबी रजिस्टर्ड इनवेस्टमेंट एडवाइजर की सलाह लेकर ही करें।)