टीवीएस ग्रुप के वेणु श्रीनिवासन के बाद अब Tata Trusts के एक और वरिष्ठ ट्रस्टी विजय सिंह भी Tata Sons को स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टिंग के समर्थन में आ गए हैं। विजय सिंह ने टाटा संस को आईपीओ के जरिए शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने की वकालत की है। करीब एक साल पहले टाटा ट्रस्ट ने एक प्रस्ताव पारित किया था जिसमें कंपनी को गैर-सूचीबद्ध (unlisted) इकाई बनाए रखने का फैसला लिया गया था। लेकिन अब वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने टाटा संस को सूचीबद्ध करने की दलील इस प्रस्ताव के उलट है।

विजय सिंह ने द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कंपनी को सूचीबद्ध करने की वकालत करते हुए कहा कि पिछले कुछ सालों से यह माना जाता रहा है कि टाटा संस को मौजूदा रूप में ही जारी रहना चाहिए। लेकिन इसके एक्सपेंशन और नई पूंजी व टेक्नोलॉजी से जुड़े बिजनेस को देखते हुए अब इस पर तुरंत दोबारा विचार करने की जरूरत है।

टाटा संस की लिस्टिंग का मुद्दा पिछले कुछ समय से विचार-विमर्श के दायरे में है क्योंकि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नियमों के अनुसार, टाटा संस को एक ‘अपर लेयर’ नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी (NBFC) माना जाता है जिसके चलते शेयर बाजार में लिस्ट होना जरूरी हो सकता है।

Tata Sons का इतिहास 100 साल पुराना

टाटा संस की लिस्टिंग के समय के बारे में बात करते हुए विजय सिंह ने कहा, ”टाटा संस का इतिहास करीब 100 साल पुराना है और तभी से इस्पात, लोकोमोटिव, बिजली और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे राष्ट्र-निर्माण परियोजनाओं में इसने अहम भूमिका निभाई है। अब इसकी भूमिका विमानन, रक्षा, सेमीकंडक्टर, बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों तक फैल गई है जिसके लिए भारी पूंजी की जरूरत होती है जिसे केवल आंतरिक संसाधनों से एक सीमा तक ही जुटाया जा सकता है।”

सूत्रों ने बताया कि टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा चाहते हैं कि टाटा संस को अनलिस्टेड इकाई के तौर पर बनी रहे। इससे पहले रतन टाटा भी टाटा संस की स्टॉक मार्केट में लिस्टिंग के खिलाफ थे।

वहीं वेणु श्रीनिवासन ने पहले कहा था, ”पब्लिक लिस्टिंग ना केवल अल्पसंख्यक शेयरधारकों के लिए वैल्यू को अनलॉक करेगी बल्कि टाटा संस की ग्रोथ को बनाए रखने के लिए पूंजी भी उपलब्ध कराएगी।”

नोएल टाटा, एन चंद्रशेखरन और दूसरे ट्रस्टी ने भेजे गए ईमेल पर कोई जवाब नहीं दिया है।

बड़े निवेश के लिए टाटा संस की लिस्टिंग जरूरी

विजय सिंह 12 साल (2025 तक) टाटा संस के बोर्ड में शामिल रहे हैं। उनका कहना है, ”अगर भारत एक विदेशी पार्टनर के साथ फाइटर एयरक्राफ्ट बनाना चाहता है तो एक बड़े निवेश की जरूरत होगी। ऐसे प्रोजेक्ट्स देश के लिए जरूरी हैं और फंड्स की कमी की वजह से कभी भी पीछे नहीं हटना चाहिए और फंड केवल एक लिस्टेड इकाई से बाजार से इकट्ठा किया जा सकता है।”

उन्होंने कहा कि टाटा संस के साइज़ और संचालन के पैमाने को देखते हुए ज्यादा पारदर्शिता जरूरी है। विजय सिंह ने आगे कहा, ”पिछले एक दशक में टाटा सन्स का मूल्य चार गुना बढ़ा है और इसके कारोबार के स्केल, वैल्यू और कर्मचारियों की संख्या को देखते हुए इसे ज्यादा पारदर्शिता और नियामकीय निगरानी की जरूरत है।”

विजय सिंह के अनुसार, ” पहले के समय में चैरिटेबल ट्रस्ट्स के जरिए नियंत्रण एक व्यवहारिक व्यवस्था थी लेकिन अब टाटा सन्स को स्थिरता और सख्त नियामकीय ढांचे की जरूरत है। हाल के वर्षों में Tata Trusts के भीतर मतभेद और अस्थिरता देखी गई है और बेहतर भविष्य की कोई गारंटी नहीं है।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या लिस्टिंग से टाटा ट्रस्ट का प्रभाव और नियंत्रण कम होगा तो उन्होंने कहा, ”मुझे नहीं लगता कि लिस्टिंग से ट्रस्ट पर कोई बड़ा असर पड़ेगा। वे अपनी बड़ी हिस्सेदारी, बोर्ड सीट आदि बनाए रखेंगे और प्रमोटर का दर्जा भी नहीं खोएंगे।”

टाट संस में टाटा ट्रस्ट की हिस्सेदारी

यह आशंका भी जताई जा रही है कि अगर Tata Sons शेयर बाजार में सूचीबद्ध होती है तो कोई अन्य बिजनस ग्रुप इसमें हिस्सेदारी खरीदकर अधिग्रहण (takeover) की कोशिश कर सकता है। हालांकि विजय सिंह का मानना है कि टाटा ट्रस्ट की बड़ी हिस्सेदारी के चलते ऐसा होना मुश्किल है। टाटा ट्रस्ट के पास टाटा संस में 66% हिस्सेदारी है और कंपनी के चेयरमैन का चुनाव भी उनकी मंजूरी से होता है।

सिंह ने कहा कि टाटा सन्स के आर्टिकल्स (नियमावली) में बदलाव करना होगा ताकि वैल्यू डिस्टॉर्शन और हितों के टकराव से बचा जा सके। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि इसमें यह स्पष्ट किया जाए कि कंपनी का मुख्य उद्देश्य देश को आगे बढ़ाना है जिसके लिए इसे सूचीबद्ध इकाई होना चाहिए।

सूत्रों के अनुसार, नटराजन चंद्रशेखर भी लिस्टिंग को जरूरी मानते हैं लेकिन कंपनी की आधिकारिक स्थिति प्राइवेट बने रहने की रही है, इसलिए वे खुलकर ऐसा नहीं कह पा रहे। एक वरिष्ठ निदेशक के मुताबिक, कुछ ट्रस्टी आरबीआई के लिस्टिंग संबंधी फैसले का विरोध नहीं करेंगे और वेणु श्रीनिवासन भी इसके खिलाफ नहीं होंगे। वहीं नोएल टाटा के लिए इसके खिलाफ सर्वसम्मति बनाना मुश्किल हो सकता है।