टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (TCE) का टाटा संस के साथ प्रस्तावित मर्जर टाटा संस की मौजूदा स्थिति को पूरी तरह बदल सकता है। इससे टाटा संस की कुल संपत्ति और आय में वित्तीय और निवेश गतिविधियों का हिस्सा कम हो जाएगा।

टाटा ट्रस्ट्स का तर्क है कि इस प्रस्ताव से टाटा संस, आरबीआई की NBFC या कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) की रेगुलेटरी परिभाषा से बाहर आ जाएगा और स्टॉक एक्सचेंजों में लिस्टिंग से बच जाएगा।

इसलिए प्रस्तावित मर्जर टाटा संस में एक बड़ा और तेजी से बढ़ता हुआ मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस लाता है, जिससे उसकी बैलेंस शीट का ऑपरेटिंग-कंपनी कंपोनेंट काफी मजबूत होता है। हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि क्या टाटा संस बोर्ड और RBI मर्जर प्रस्ताव को मंजूरी देंगे।

क्या टाटा संस बोर्ड सहमत होगा?

ग्रुप में पावर स्ट्रगल को देखते हुए, मिलियन-डॉलर का सवाल यह है: क्या टाटा संस का बोर्ड टाटा ट्रस्ट्स के प्रस्ताव से सहमत होगा?

बोर्ड ने 4:1 के बहुमत से फैसला लिया कि RBI द्वारा 17 सितंबर को अपनी मीटिंग में बताए गए तरीके से लिस्टिंग के लिए कदम उठाए जाएंगे। चार डायरेक्टर (हरीश मनवानी, अनीता एम जॉर्ज, वेणु श्रीनिवासन और सौरभ अग्रवाल) ने लिस्टिंग प्रोसेस को मंजूरी दी। सिर्फ नोएल टाटा ने इस प्लान का विरोध किया।

टाटा ग्रुप पर नजर रखने वाले एक ऑब्जर्वर ने कहा, “टाटा संस का बोर्ड मीटिंग कर सकता है और नए प्रपोजल पर फैसला ले सकता है। 17 सितंबर की मीटिंग के टोन को देखते हुए, वे इसका विरोध कर सकते हैं। अगर बोर्ड सहमत भी हो जाता है, तो आरबीआई को मनाना होगा।”

दूसरा सवाल यह है कि क्या आरबीआई ट्रस्टों के रीऑर्गेनाइजेशन प्लान पर सहमत होगा। सेंट्रल बैंक के पास एनबीएफसी सेक्टर के रेगुलेशन में काफी अधिकार हैं। टाटा संस के सामने जो रेगुलेटरी मुद्दा है, वह आरबीआई द्वारा उसे अपर-लेयर एनबीएफसी के तौर पर क्लासिफाई करने से पैदा हुआ है। कंपनी ने एनबीएफसी फ्रेमवर्क से डीरजिस्ट्रेशन की मांग की थी, लेकिन आरबीआई ने रिजेक्ट कर दी।

टाटा संस अब मुख्य रूप से टाटा ग्रुप की प्रिंसिपल होल्डिंग कंपनी के तौर पर काम करती है, जिसमें कई ग्रुप कंपनियों में काफी इन्वेस्टमेंट हैं। टाटा संस को कई अगर-मगर का भी सामना करना पड़ रहा है: चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के लिए AGM की मंजूरी, AGM का स्टेटस और सर रतन टाटा ट्रस्ट पर रोक का ऑर्डर हटाना।

हालांकि, सिर्फ रीस्ट्रक्चरिंग से यह गारंटी नहीं मिलती कि टाटा संस NBFC या CIC नहीं रहेगी और RBI इसे मंजूरी देगा या नहीं।

आखिरी नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि ट्रांजैक्शन का सही स्ट्रक्चर क्या है, मर्जर के बाद बिज़नेस की बनावट क्या है और RBI रीस्ट्रक्चर की गई एंटिटी पर ज़रूरी रेगुलेटरी क्राइटेरिया कैसे लागू करता है और टाटा संस का बोर्ड इसे हरी झंडी देता है या नहीं।

इसे कम इन्वेस्टमेंट कंपनी बनाएं

टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और TCE को मर्जर के जरिए टाटा संस में लाकर, ग्रुप होल्डिंग कंपनी के इन्वेस्टमेंट एक्सपोज़र के एक हिस्से को डायरेक्ट ऑपरेटिंग बिजनेस में बदल देगा। NBFC और CIC को कंट्रोल करने वाले रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के तहत यह फर्क जरूरी है।

CIC असल में एक एंटिटी है जिसका मुख्य बिजनेस ग्रुप कंपनियों के शेयर और सिक्योरिटीज खरीदना है, जो RBI के रेगुलेटरी क्राइटेरिया के तहत आता है। प्रस्तावित रीस्ट्रक्चरिंग टाटा संस के नेचर और कंपोजिशन को बदलने के लिए डिजाइन की गई लगती है, ताकि यह अब मुख्य रूप से एक इन्वेस्टमेंट-होल्डिंग व्हीकल न रहे।

आसान शब्दों में स्ट्रैटेजी यह है कि टाटा संस को एक ऑपरेटिंग कंपनी ज्यादा और इन्वेस्टमेंट कंपनी कम बनाया जाए। मर्जर से यह दो तरीकों से हो सकता है। पहला, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग और सेमीकंडक्टर बिज़नेस सीधे टाटा संस में लाएगा। दूसरा, TCE एक स्थापित इंजीनियरिंग और कंसल्टेंसी ऑपरेशन जोड़ेगा जिसका अपना अच्छा-खासा रेवेन्यू होगा।

अगर, रीस्ट्रक्चरिंग के बाद टाटा संस अब CIC या NBFC के तौर पर क्लासिफिकेशन के लिए रेगुलेटरी शर्तों को पूरा नहीं करता है, तो जरूरी लिस्टिंग की जरूरत का आधार भी बदल सकता है। इसलिए प्रस्तावित स्ट्रक्चर का मकसद सिर्फ़ ग्रुप एसेट्स को रीऑर्गेनाइज़ करना नहीं है, बल्कि खुद टाटा संस के रेगुलेटरी कैरेक्टर को बदलना है।

इस तरह, टाटा संस मुख्य रूप से टाटा ग्रुप की कंपनियों में बड़े इन्वेस्टमेंट वाली एक होल्डिंग कंपनी बने रहने के बजाय, सीधे टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और TCE जैसे बड़े बिज़नेस का मालिक होगा और उन्हें ऑपरेट करेगा।

ग्रुप में चौथी सबसे बड़ी

टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, टाटा ग्रुप में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले ऑपरेटिंग बिजनेस में से एक बनकर उभरा है। सिर्फ चार सालों में (यह 131,082 करोड़ रुपये के रेवेन्यू के साथ) रेवेन्यू के हिसाब से ग्रुप की चौथी सबसे बड़ी कंपनी बन गई है। इसके 86,466 कर्मचारियों में से लगभग दो-तिहाई महिलाएं हैं।

कंपनी इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन में एक इंटीग्रेटेड प्लेयर के तौर पर खुद को स्थापित कर रही है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन, एडवांस्ड पैकेजिंग और स्वदेशी चिप डेवलपमेंट शामिल हैं।

इसका ऑपरेटिंग प्रॉफ़िट पहले ही ब्रेक-ईवन पर पहुंच गया है, जो कैपिटल-इंटेंसिव स्टार्ट-अप फेज से कमर्शियल ऑपरेशन की ओर एक बड़ा बदलाव दिखाता है। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने दुनिया भर में बनाए गए कुल फोन का लगभग 12% बनाया।

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टाटा संस के कंट्रोल और मैनेजमेंट को लेकर बढ़ती लड़ाई के बीच, 2021 में टाटा-साइरस मिस्त्री विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला फिर से अहम हो गया है। टाटा ट्रस्ट्स की ओर से नियुक्त सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने रविवार को इस फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि कोर्ट ने टाटा संस के साथ संबंधों में “साफ तौर पर टाटा ट्रस्ट्स को प्राथमिकता दी है”। यहां पढ़ें पूरी खबर…