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SBI कर रहा Teaser Loans लाने की तैयारी, आपके लिए बेहद अनूठी है यह सेवा

State Bank of India: भारत में एसबीआई ने पहली बार 2009 में टीजर लोन देने की शुरुआत की थी। बैंक ने क्रेडिट ग्रोथ और हाउसिंग कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री को बूस्ट करने के लिए यह कदम उठाया था।

भारतीय स्टेट बैंक

State Bank of India: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) टीजर लोन देने की तैयारी में है। अगर देश का का सबसे बड़ा सरकारी बैंक इस दिशा मेंआगे बढ़ता है तो इससे करोड़ों ग्राहकों को फायदा होगा। यह अनूठी सेवा जल्द ही शुरू हो सकती है। स्टेट बैंक के चेयरमैन रजनीश कुमार ने कहा है कि इस संबंध में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) से इस बारे में स्पष्टीकरण मांगेगा कि क्या वह शुरुआत में एक फिक्स्ड रेट के तहत होम लोन मुहैया करवा सकते हैं या नहीं। इसके बाद फ्लोटिंग रेट के तहत ब्याज दर तय कर दी जाएंगी।

बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब एसबीआई इसपर आगे बढ़ रहा हो। इससे पहले भी बैंक ऐसा कर चुका है। इसके पहले के प्रयासों को नियामक द्वारा विफल कर दिया गया था। दरअसल टीजर लोन फिक्स्ड और फ्लोटिंग रेट का कॉम्बिनेशन होता है। यह लोन कई मायनों में आकर्षक होते हैं। टीजर लोन उकने लिए काफी फायदेमंद साबित होते हैं जो ब्याज दरों के फिक्सड न होने से काफी चिंतित रहते हैं। टीजर लोन में ग्राहकों को एक निश्चित समय के लिए सामान ब्याज दर पर लोन दिया जाता है। जब यह समय समाप्त हो जात है तो फ्लोटिंग रेट के तहत ब्याज लिया जाता है। अगर ये कहा जाए कि टीजर लोन कई मायनों में फिक्सड होम लोन की तरह ही फायदे देते है तो ये कहना एकदम सही होगा।

भारत में एसबीआई ने पहली बार 2009 में टीजर लोन देने की शुरुआत की थी। बैंक ने क्रेडिट ग्रोथ और हाउसिंग कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री को बूस्ट करने के लिए यह कदम उठाया था। एसबीआई फिक्सड रेट के तहत 8 प्रतिशत की ब्याज दर से पहले साल के लिए लोन मुहैया करवा रही थी। वहीं दूसरे और तीसरे साल पर यह दर 9 प्रतिशत थी। तीन साल पूरे होने के बाद बाजार की प्रचलित बाजार दर के आधार पर ही ब्याज दर वसूली जाती है।

आरबीआई रहा है विरोध में: लोन बांटने की इस व्यवस्था का रिजर्व बैंक विरोध करता रहा है। आरबीआई का कहना है कि कुछ समय के लिए ब्याज दर कम देने वाले ग्राहक इस ऑफर की तय सीमा खत्म होने के बाद जब बढ़ी हुई ईएमआई देखते हैं तो उन्हें धक्का लगता है। ऐसे में कर्ज लेने वाले पहले तीन साल के मुकाबले बाद में ईएमआई चुकाने में असमर्थ हो जाते हैं। आरबीआई ने दिसंबर 2010 में एक सुर्कुलर जारी कर इसका कड़ा विरोध किया था।

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