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और गहराया अर्थव्यवस्था का संकट, छोटे कारोबारियों की बढ़ेगी मुश्किलें!

कुछ ही दिन पहले ही देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 25 तिमाहियों में सबसे निचले स्तर पर चले जाने यानी पांच प्रतिशत तक पहुंच जाने की बात सामने आयी है। ऐसे में यह सर्वेक्षण अर्थव्यवथा का संकट और गहराने की ओर इशारा करता है।

Author नई दिल्ली | Updated: September 4, 2019 11:34 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अर्थव्यवस्था का संकट और गहराता दिखाई दे रहा है। लघु उद्योग क्षेत्र में धारणा अर्थव्यवस्था के व्यापक हालातों से प्रभावित होने के संकेत हैं। यह बात सार्वजनिक क्षेत्र के सिडबी के एक तिमाही सर्वेक्षण में सामने आयी है। कुछ ही दिन पहले ही देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 25 तिमाहियों में सबसे निचले स्तर पर चले जाने यानी पांच प्रतिशत तक पहुंच जाने की बात सामने आयी है। ऐसे में यह सर्वेक्षण अर्थव्यवथा का संकट और गहराने की ओर इशारा करता है।
सर्वेक्षण रेग एजेंसी क्रिसिल के साथ मिलकर किया गया है। इसे मंगलवार को जारी किया गया। हालांकि, इस क्षेत्र में रोजगार को लेकर धारणा सकारात्मक दिख रही है। आधिकारिक बयान के अनुसार क्रिसिडेक्स जून तिमाही में गिरकर 120 अंक पर आ गया जबकि इससे पिछली मार्च तिमाही में यह 122 अंक पर था। क्रिसिडेक्स सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग परिदृश्य का सूचकांक है।

बता दें कि अर्थव्यवस्था की मौजूदा नरमी की गंभीरता और उसके कारणों को लेकर छिड़ी बहस के बीच सेंटर फार ग्लोबल डेवलपमेंट रिसर्च के निदेशक और आर्थिक शोध संस्थान एनसीएईआर के पूर्व वरिष्ठ फैलो प्रोफेसर कन्हैया सिंह का कहना है कि भारत में वास्तविक ब्याज दर ऊंची बने रहने से निवेश प्रभावित हुआ और इसमें बाधा खड़ी हुई। सिंह का कहना है कि पिछले दो- ढाई साल से खुदरा मुद्रास्फीति चार प्रतिशत अथवा इसके आसपास बनी रही लेकिन इस दौरान रिजर्व बैंक ने अपनी प्रमुख दर रेपो को कम नहीं किया। अप्रैल 2016 से अप्रैल 2019 तक रेपो दर छह से साढ़े छह प्रतिशत के दायरे में रही। इसके पÞरिणामस्वरूप बैंकों की विभिन्न कर्ज की ब्याज दर भी 9 प्रतिशत से ऊपर बनी रही।

यहां यह उल्लेखनीय है कि रिजर्व बैंक ने कुछ साल पहले अपनी मौद्रिक नीति का आधार थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति से बदलकर खुदरा मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति पर केन्द्रित कर दिया था। नरेन्द्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सितंबर 2016 के बाद खुदरा मुद्रास्फीति (सीपीआई सूचकांक आधारित) बीच के कुछ महीनों को छोड़कर चार प्रतिशत से कम या फिर इसके आसपास बनी रही।

सह ने आने वाले महीनों में आर्थिक वृद्धि तेज होने की उम्मीद जताते हुये कहा कि जून 2019 के बाद रिजर्व बैंक की रेपो दर छह प्रतिशत से नीचे आई है और अगस्त की मौद्रिक समीक्षा में यह और घटकर 5.40 प्रतिशत रह गई। इसके साथ ही वाणिज्यिक बैंकों ने अपनी कर्ज की दरों को रेपो दर के साथ जोड़ना शुरू कर दिया है। इसका अर्थव्यवस्था पर अनुकूल असर पड़ेगा। कर्ज सस्ता होगा और मुद्रास्फीति के चार प्रतिशत से नीचे रहने के चलते वास्तविक ब्याज दर भी कम रहेगी। इसका निवेश पर अनुकूल असर होगा।

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