भारत ने शुक्रवार को SHANTI एक्ट के लिए ड्राफ्ट नियम नोटिफाई किए। जिससे निजी कंपनियों के लिए न्यूक्लियर एनर्जी सेक्टर में आने का रास्ता खुल गया। ये नियम ऑपरेटर की जिम्मेदारी, फाइनेंशियल सुरक्षा, वेस्ट मैनेजमेंट और रेडिएशन से सुरक्षा के लिए कई पुराने नियमों की जगह लेंगे। इसमें लंबे समय तक रेगुलेटरी निगरानी और विदेशी रिएक्टर लगाने की शर्तें भी शामिल हैं।
सरकारी डेटा के अनुसार, भारत की मौजूदा न्यूक्लियर एनर्जी क्षमता 8.78 गीगावाट है। देश के अलग-अलग हिस्सों में कई 700 MW और 1000 MW के स्वदेशी रिएक्टर विकसित किए जा रहे हैं और 2031-32 तक क्षमता के 22 GW के आंकड़े को पार करने का अनुमान है।
क्या है SHANTI एक्ट?
इसका उद्देश्य न्यूक्लियर एनर्जी क्षमता को तेजी से बढ़ाना और 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करना है। यह भारत के न्यूक्लियर कानूनों को एक साथ लाता है और अपडेट करता है। जिससे क्लीन-एनर्जी की ओर बढ़ने और 2047 तक 100 गीगावाट न्यूक्लियर एनर्जी क्षमता हासिल करने के लंबे समय के लक्ष्य को सपोर्ट मिलता है।
यह लंबे समय से चले आ रहे सरकारी एकाधिकार को भी खत्म करता है और पहली बार निजी कंपनियों के लिए इस सेक्टर को खोलता है। सरकारी अपडेट के अनुसार, इन कंपनियों को अब एटॉमिक मिनरल की खोज, फ्यूल बनाने, उपकरण बनाने और शायद प्लांट के संचालन के कुछ पहलुओं जैसी मुख्य गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति होगी। वहीं, सरकार संवेदनशील फ्यूल साइकिल गतिविधियों पर अपना नियंत्रण बनाए रखेगी।
केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने जुलाई के आखिर में राज्यसभा को बताया, “SHANTI एक्ट भारत सरकार के न्यूक्लियर एनर्जी मिशन पर केंद्रित है, जिसका लक्ष्य 2047 तक 100 GW हासिल करना है। यह एक्ट न्यूक्लियर एनर्जी सेक्टर को प्राइवेट भागीदारी के लिए खोलता है।”
SHANTI एक्ट एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड को कानूनी मान्यता देकर कानूनी रेगुलेशन को भी मज़बूत करता है।
SHANTI एक्ट के ड्राफ्ट नियम – मुख्य जानकारी
एटॉमिक एनर्जी विभाग ने शुक्रवार को SHANTI एक्ट के लिए ड्राफ्ट नियम जारी किए। जिसमें प्राइवेट कंपनियों के लिए ऑपरेटर की ज़िम्मेदारियों और फाइनेंशियल सुरक्षा उपायों की रूपरेखा दी गई है। ड्राफ्ट में यह भी जरूरी है कि विदेशी न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी के डिजाइन को उसके मूल देश की रेगुलेटरी संस्था से मंजूरी मिली हो।
न्यूक्लियर पावर प्लांट या रिएक्टर लगाने की इच्छुक योग्य संस्थाओं को लाइसेंस के लिए आवेदन करना होगा और स्क्रीनिंग प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। आवेदक ‘सैद्धांतिक मंज़ूरी’ मिलने के बाद ही रिएक्टर टेक्नोलॉजी वेंडर्स के साथ बातचीत शुरू कर सकता है और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर सकता है। यह मंजूरी तब भी दी जा सकती है जब साइट या टेक्नोलॉजी का चुनाव न हुआ हो।
ड्राफ्ट नियमों में यह भी कहा गया है कि संबंधित स्टोरेज पूल से सारा इस्तेमाल किया हुआ ईंधन हटाए जाने तक फाइनेंशियल सिक्योरिटी बनाए रखनी होगी। न्यूक्लियर प्लांट ऑपरेटर्स से इंश्योरेंस पॉलिसी बनाए रखने और न्यूक्लियर नुकसान के लिए फाइनेंशियल सिक्योरिटी सुनिश्चित करने को भी कहा गया है।
शुक्रवार को शेयर की गई रूपरेखा के अनुसार, केंद्र सरकार हर पांच साल में एक बार एक्सपर्ट्स का ग्रुप बनाएगी जो न्यूक्लियर नुकसान के लिए ऑपरेटर की सिविल लायबिलिटी (नागरिक दायित्व) की अधिकतम सीमा की समीक्षा करेगा।
इसमें यह भी बताया गया है कि न्यूक्लियर पावर प्लांट या रिएक्टर के निर्माण, मालिकाना हक, संचालन और डीकमीशनिंग (काम बंद करने) के लिए एक ही कंबाइंड लाइसेंस होगा।
प्राइवेट कंपनियों के लिए मुख्य सुरक्षा उपाय
– न्यूक्लियर पदार्थों के लिए सख्त रिकॉर्ड-कीपिंग, मटीरियल बैलेंस और इन्वेंट्री वेरिफिकेशन। मटीरियल ट्रैकिंग और अन्य अनुपालन विवरणों की देखरेख के लिए एक मंज़ूर अधिकारी की नियुक्ति अनिवार्य है।
– डिजिटल कंट्रोल सिस्टम की सुरक्षा और न्यूक्लियर डेटा पर प्रतिबंध। ड्राफ्ट नियमों में चोरी, तोड़-फोड़ या अनधिकृत प्रवेश को रोकने के लिए कई स्तरों वाली फिजिकल बैरियर और एक्सेस लिमिट भी अनिवार्य की गई हैं।
– ऑपरेटर्स को निर्माण से लेकर डीकमीशनिंग तक के लिए एक ही, अलग न किए जा सकने वाले कंबाइंड लाइसेंस की जरूरत होगी। जिसमें अनिवार्य सरकारी समीक्षा और सख्त क्वालिटी स्टैंडर्ड्स शामिल होंगे।
– लाइसेंस धारकों को रेडियोधर्मी कचरे के लिए विनियमित रोकथाम और निपटान लागू करना होगा।
‘विदेशी न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी को मंजूरी मिलनी चाहिए’
ड्राफ्ट नियमों के तहत किसी भी विदेशी न्यूक्लियर पावर प्लांट या रिएक्टर के लिए यह अनिवार्य है कि उसके डिज़ाइन को उसके मूल देश की रेगुलेटरी बॉडी से सर्टिफाइड कराया जाए। इसमें यह भी जोड़ा गया है कि ऐसी टेक्नोलॉजी उस देश या किसी अन्य विदेशी देश में पहले से ही चालू होनी चाहिए।
ऑफिशियल ड्राफ्ट में कहा गया है, “इन नियमों में ‘मूल देश’ का मतलब उन देशों से है जो न्यूक्लियर रिएक्टर डिजाइन और सप्लाई चेन इकोसिस्टम में आत्मनिर्भर हैं और जिनकी रेगुलेटरी मंज़ूरी पर दुनिया भर में भरोसा किया जाता है।”
अगर कोई न्यूक्लियर पावर प्लांट या रिएक्टर विदेशी डिजाइन का है, तो उसके डिजाइन को मूल देश में उसकी रेगुलेटरी बॉडी द्वारा सर्टिफाइड या मंज़ूर किया जाना चाहिए और उसे मूल देश या किसी अन्य विदेशी देश में चालू होना चाहिए।
आयात की जाने वाली या घरेलू स्तर पर हासिल की जाने वाली टेक्नोलॉजी भारत के हितों पर बुरा असर न डाले, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए अनुचित रिस्क पैदा न करे और एक्ट के तहत बनाई गई राष्ट्रीय नीतियों के अनुरूप हो।
यह भी पढ़ें: 8वें वेतन आयोग में क्या मिलेगा बड़ा फायदा?
सरकारी कर्मचारियों की तरह अब केंद्रीय पेंशनर्स की नजर भी 8वें वेतन आयोग पर टिकी है। हालांकि इस बार चर्चा सिर्फ पेंशन बढ़ने तक सीमित नहीं है। देश के कई पेंशनर संगठन पेंशन तय करने के तरीके, उम्र के आधार पर अतिरिक्त राहत, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) जैसे मुद्दों को भी आयोग के सामने उठा रहे हैं। यहां पढ़ें पूरी खबर…
