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लिज्जत पापड़: 80 रुपये के कर्ज से शुरुआत, आज 800 करोड़ का अंपायर

1950 में सात गुजराती महिलाओं ने रोजी-रोटी चलाने के लिए पापड़ बनाने का काम शुरू किया था। उनके पास यही एक हुनर था जिससे वे अपना खर्च चला सकती थीं लेकिन इतने पैसे भी नहीं थे कि काम शुरू कर सकतीं। उन्होंने सर्वेंट्स ऑफ इंडिया के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता छगनलाल करमसी पारेख से 80 रुपये उधार मांगे।

(Image Source: Facebook/Piyush Agarwal)

गुजराती में लिज्जत का मतलब होता है- स्वादिष्ट, आज से 68 साल पहले जब बॉम्बे में 7 गुजराती महिलाओं ने एक खास स्वाद को शक्ल दी तो वह ‘लिज्जत पापड़’ कहलाया। दूरदर्शन देखने वाली और उसके बाद की पीढ़ी में से लगभग सभी को इसके खास ‘कुर्रम-कुर्रम…’ विज्ञापन ने मनोरंजन के साथ-साथ खूब ललचाया। सैकड़ों करोड़ों के साम्राज्य वाले इस ब्रांड के पीछे की एक कहानी है। इंटरनेट पर प्रकाशित रिपोर्ट्स पर यकीन करें तो कभी 80 रुपये कर्ज लेकर शुरू किया गया ब्रांड आज 800 करोड़ का है। याहू की रिपोर्ट के मुताबिक लिज्जत पापड़ के सफल सहकारी रोजगार ने 43 हजार महिलाओं को काम दिया है। 1950 में सात गुजराती महिलाओं ने रोजी-रोटी चलाने के लिए पापड़ बनाने का काम शुरू किया था। उनके पास यही एक हुनर था जिससे वे अपना खर्च चला सकती थीं लेकिन इतने पैसे भी नहीं थे कि काम शुरू कर सकतीं। उन्होंने सर्वेंट्स ऑफ इंडिया के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता छगनलाल करमसी पारेख से 80 रुपये उधार मांगे।

इस राशि से नुकसान में चल रहे पापड़ बनाने के उद्यम को खरीदा गया और सामग्री और बुनियादी ढांचा जुटाया। काम चल निकला। इससे महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए महिलाओं के ही द्वारा ही संचालित एक ऐतिहासिक कंपनी खड़ी हो गई। 15 मार्च 1959 को मशहूर मर्चेंट भूलेश्वर और मुंबई के एक मशहूर मार्केट में पापड़ के पैकेट बेचे जाने लगे। शुरुआती दिन आसान नहीं थे। छगनलाल पारेख उर्फ छगनबप्पा का दिशा निर्देशन मिलता रहा।

शुरू में दो गुणवत्ताओं वाले पापड़ बनाए जाते थे, इनमें एक प्रकार के पापड़ सस्ते थे लेकिन छगनबप्पा ने सलाह दी कि कभी भी किसी प्रकार का समझौता न करते हुए उच्च गुणवत्ता वाले पापड़ बनाए जाएं। छगनबप्पा ने जोर दिया कि इस काम को व्यापार उद्यम के तौर पर लिया जाए और सही तरीके से खाते संभाले जाएं। लिज्जत ने सहकारी योजना के तौर पर विस्तार किया। शुरू में छोटी लड़कियां भी काम करती थीं लेकिन बाद में तय हुआ के कम से कम 18 वर्ष की युवतियों को काम दिया जाएगा। तीन महीने के भीतर 25 महिलाएं पापड़ बनाने के काम में लगीं।

पहले वर्ष में पापड़ की बिक्री 6196 रुपये की हुई। टूटे हुए पापड़ पड़ोंसियों में बांट दिए जाते थे। धीरे-धीरे लोगों के द्वारा और स्थानीय समाचार पत्रों में लेखों के द्वारा पापड़ मशहूर होने लगा। दूसरे वर्ष में करीब डेढ़ सौ महिलाएं काम से जुड़ीं और साल के आखिर तक उनकी संख्या 300 हो गई। 1962 में पापड़ का नाम लिज्जत और संगठन का नाम श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ रखा गया। आज बाजार में इस संगठन की ओर से कई प्रकार के पापड़ समेत मसाले, अचार, आटा, चपातियां, डिटर्जेंट पाउडर और केक और लिक्विड डिटर्जेंट उपलब्ध हैं।

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