SEBI New Circular : देश के मार्केट रेगुलेटर सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (Securities and Exchange Board of India) यानी SEBI ने म्यूचुअल फंड स्कीमों के कैटेगराइजेशन और उनके नाम तय करने के बारे में नया सर्कुलर जारी किया है। गुरुवार 26 फरवरी 2026 को जारी इस सर्कुलर की सबसे बड़ी बात ये है कि इसके जरिये सॉल्यूशन ओरिएंटेड स्कीम कैटेगरी को बंद कर दिया गया है। इसके अलावा इक्विटी म्यूचुअल फंड्स की परिभाषा, उनके द्वारा इक्विटी में निवेश की अनिवार्य सीमा और दो स्कीम्स के बीच पोर्टफोलियो के ओवरलैप से जुड़े नियमों में भी कई बड़े बदलाव किए गए हैं। आइए देखते हैं इस नए सर्कुलर की बड़ी बातें।
1. सॉल्यूशन ओरिएंटेड स्कीम बंद
सेबी ने अपने नए सर्कुलर में सॉल्यूशन ओरिएंटेड स्कीम की कैटेगरी को तत्काल प्रभाव से बंद करने का आदेश दिया है। इस कैटेगरी की सभी मौजूदा स्कीम्स में सब्सक्रिप्शन फौरन बंद कर दिया गया है। साथ ही यह भी बताया गया है कि इस कैटेगरी की इन स्कीम को समान एसेट एलोकेशन और रिस्क प्रोफाइल वाली दूसरी स्कीम्स में मिला दिया जाएगा। ऐसा करने से पहले सेबी की मंजूरी लेनी होगी।
2. नई कैटेगरी : लाइफ साइकल फंड
सेबी ने पहली बार “लाइफ साइकल फंड” नाम से नई कैटेगरी शुरू की है। ये ऐसे फंड होंगे जो तय समय अवधि (जैसे 10, 15 या 30 साल) के लिए बनाए जाएंगे और समय के साथ-साथ अपने पोर्टफोलियो में इक्विटी और डेट का रेशियो बदलेंगे। शुरुआती वर्षों में इनमें इक्विटी ज्यादा होगी और जैसे-जैसे मैच्योरिटी पास आएगी, इक्विटी कम करके डेट का हिस्सा बढ़ाया जाएगा। इसका मकसद लक्ष्य आधारित निवेश को आसान बनाना है, जैसे रिटायरमेंट या बच्चों की पढ़ाई। पहले इस तरह की योजनाओं को सॉल्यूशन ओरिएंटेड स्कीम्स (Solution‑Oriented Schemes) की कैटेगरी में रखा जाता था।
3. इक्विटी में मिनिमम इनवेस्टमेंट बढ़ा
नए नियमों के तहत कई इक्विटी फंड कैटेगरीज में इक्विटी में मिनिमम इनवेस्टमेंट की लिमिट को बढ़ा दिया गया है। पहले कई स्कीमों में 65 प्रतिशत इक्विटी इनवेस्टमेंट जरूरी था, जिसे अब बढ़ाकर 80 प्रतिशत कर दिया गया है। इसमें शामिल हैं –
- – डिविडेंड यील्ड फंड
- – वैल्यू फंड
- – कॉन्ट्रा फंड
- – फोकस्ड फंड
इसका मतलब यह हुआ कि इन स्कीमों में अब ज्यादा पैसा सीधे शेयर्स में लगाया जाएगा और डेट या अन्य इंस्ट्रूमेंट्स का हिस्सा कम हो जाएगा। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि इससे हाई रिटर्न की संभावना तो बढ़ सकती है, लेकिन साथ ही रिस्क में इजाफा होने की आशंका भी रहेगी।
4. ओवरलैपिंग पर नियम और सख्त
सेबी ने फंड हाउसेज के लिए अलग-अलग स्कीम्स के पोर्टफोलियो में ओवरलैपिंग को लेकर नए नियम बनाए हैं, जो पहले से ज्यादा सख्त हैं। खासकर सेक्टोरल और थीमैटिक फंड्स के लिए कहा गया है कि किसी एक सेक्टोरल या थीमैटिक स्कीम का पोर्टफोलियो उससे मिलती-जुलती दूसरी कैटेगरी की स्कीम के साथ 50 प्रतिशत से ज्यादा ओवरलैप नहीं होना चाहिए। यह नियम लार्ज कैप स्कीम्स को छोड़कर बाकी सभी इक्विटी स्कीमों पर लागू होगा। पहले ओवरलैप का कैलकुलेशन अनिवार्य नहीं था, लेकिन अब हर तिमाही में ऐसा करना जरूरी होगा। यह कैलकुलेशन औसत डेली पोर्टफोलियो के आधार पर किया जाएगा।
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5. ओवरलैपिंग रूल्स पर 3 साल में अमल
जो मौजूदा सेक्टोरल या थीमैटिक स्कीम्स ओवरलैपिंग से जुड़े इन नियमों पर खरी नहीं उतरतीं, उन्हें तीन साल के भीतर अपने पोर्टफोलियो में बदलाव करके इन पर अमल करना होगा।
अगर तीन साल बाद भी कोई स्कीम इन शर्तों को पूरा नहीं कर पाती, तो उसे ओवरलैपिंग वाली मिलती-जुलती दूसरी स्कीम में मर्ज करना होगा।
इससे बाजार में बहुत ज्यादा मिलती-जुलती स्कीमों की संख्या घटेगी और निवेशकों को इनवेस्टमेंट के ऑप्शन समझने में आसानी होगी।
6. वैल्यू और कॉन्ट्रा फंड दोनों की इजाजत
पहले नियम यह था कि कोई भी फंड हाउस या तो वैल्यू फंड चला सकता था या कॉन्ट्रा फंड। लेकिन नए सर्कुलर में सेबी ने दोनों को एक साथ चलाने की इजाजत दे दी है। लेकिन शर्त यही है कि दोनों स्कीमों के पोर्टफोलियो में 50 प्रतिशत से ज्यादा ओवरलैप नहीं होना चाहिए।
इससे एसेट मैनेजमेंट कंपनियों को रणनीति के हिसाब से ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी मिलेगी और निवेशकों को ज्यादा ऑप्शन मिलेंगे।
7. 13 किस्म की इक्विटी स्कीम
नए सर्कुलर में इक्विटी स्कीमों की कैटेगरी की संख्या 11 से बढ़ाकर 13 कर दी गई है। सेक्टोरल और थीमैटिक फंड्स को अलग-अलग कैटेगरी बना दिया गया है, जिन्हें पहले एक साथ रखा जाता था। अब इक्विटी स्कीम्स की मुख्य कैटेगरी इस तरह हैं – मल्टी कैप, लार्ज कैप, लार्ज एंड मिड कैप, मिड कैप, स्मॉल कैप, फ्लेक्सी कैप, डिविडेंड यील्ड, वैल्यू, कॉन्ट्रा, फोकस्ड, सेक्टोरल, थीमैटिक और ELSS टैक्स सेवर फंड। (ELSS को अब “ELSS-Tax Saver Fund” कहा जाएगा।)
नए सर्कुलर में कहा गया है कि स्कीम का नाम उसकी कैटेगरी के अनुरूप ही होना चाहिए। ऐसे शब्द इस्तेमाल नहीं किए जा सकेंगे जो रिटर्न को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हों। यानी अब नाम से ही यह साफ दिखना चाहिए कि स्कीम किस तरह की है और उसमें पैसा कहां लगाया जाएगा।
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निवेशकों के लिए नए नियमों मतलब
सेबी के नए सर्कुलर से लागू होने वाले बदलावों का सीधा असर निवेशकों पर पड़ेगा। एक तरफ, ज्यादा इक्विटी निवेश का मतलब बेहतर रिटर्न की संभावना हो सकती है, लेकिन साथ ही मार्केट से जुड़ा रिस्क भी बढ़ सकता है। दूसरी तरफ, ओवरलैप कम होने से अलग-अलग स्कीमों के बीच फर्क साफ नजर आएगा और पोर्टफोलियो बनाना आसान होगा। कुल मिलाकर सेबी के इस कदम को म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री को ज्यादा ट्रांसपेरेंट, फ्लेक्सिबल और निवेशकों के लिए समझने में आसान बनाने की दिशा में आगे बढ़ाने वाला माना जा रहा है।
(डिस्क्लेमर : इस लेख में दी गई जानकारी SEBI के नए सर्कुलर पर आधारित है। म्यूचुअल फंड में निवेश करने से पहले बाजार से जुड़े रिस्क को समझना अनिवार्य है। निवेश का कोई भी फैसला पूरी जानकारी हासिल करने के बाद और सेबी रजिस्टर्ड इनवेस्टमेंट एडवाइजर की सलाह लेकर ही करें।)
