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कोयला घोटाला: सीबीआई के पूर्व निदेशक फंसे, सुप्रीम कोर्ट ने जांच के लिए गठित की एसआईटी

खंडपीठ ने कहा कि सिन्हा द्वारा अधिकार का दुरुपयोग के मामले की जांच के लिये पहली नजर में ‘निश्चित ही’ मामला बनता है।

Author नई दिल्ली | January 23, 2017 9:11 PM
Coal Scam, Ranjit Sinha, Closure Report, Special court, Supreme Courtपूर्व सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा। (फाइल फोटो)

केन्द्रीय जांच ब्यूरो के पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा के लिए सोमवार (23 जनवरी) को उस समय नई परेशानी आ गयी जब उच्चतम न्यायालय ने कोयला घोटाले के मामले में जांच प्रभावित करने के लिये पहली नजर में ‘अधिकार का दुरुपयोग’ करने के आरोपों की जांच के लिये विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित कर दिया। न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति ए के सिकरी की खंडपीठ ने कहा कि सिन्हा द्वारा अधिकार का दुरुपयोग के मामले की जांच के लिये पहली नजर में ‘निश्चित ही’ मामला बनता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि सीबीआई के मौजूदा निदेशक विशेष जांच दल का नेतृत्व करेंगे जो शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त समिति की रिपोर्ट का अवलोकन करेगी। न्यायालय ने जांच ब्यूरो के पूर्व विशेष निदेशक एम एल शर्मा की अध्यक्षता में यह समिति गठित की थी जिसने इस मामले में सिन्हा को पहली नजर में दोषी पाया है।

पीठ ने अपने चार पृष्ठ के आदेश में कहा कि हमने इस बारे में विचार किया कि क्या जांच के लिये किसी बाहरी संस्था को विशेष जांच दल के रूप में नियुक्त किया जाना चाहिए। हालांकि, हमारा विचार है चूंकि ब्यूरो के मुखिया बदल गये हैं, इसलिए हम सीबीआई में अपना विश्वास वयक्त करते हैं कि एम एल शर्मा की रिपोर्ट और अन्य संबंधित दस्तावेजों पर गौर करते हुये वह कोयला घोटाले के मामलों की जांच को प्रभावित करने के लिये रंजीत सिन्हा द्वारा पहली नजर में पद के दुरुपयोग के आरोपों की विशेष जांच दल के रूप में जांच करेगी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने याचिकाकर्ता द्वारा लगाये गये आरोपों के गुणदोष अथवा शर्मा समिति की रिपोर्ट के तथ्यों पर किसी भी प्रकार की राय व्यक्त नहीं की है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि केन्द्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक इस जांच के बारे में न्यायालय को सूचित करने और मुख्य सतर्कता आयोग को विश्वास में लेने के बाद इस मामले में मदद के लिये अपनी पसंद के दो अधिकारी ले सकते हैं। पीठ ने कहा कि कोयला घोटाले से संबंधित मामलों के लिये विशेष लोक अभियोजक आर एस चीमा ब्यूरो के निदेशक और उसके दल की इस मामले में कानूनी बिन्दुओं पर मदद करेंगे। पीठ ने कहा कि चंकि जांच ब्यूरो के निदेशक को निश्चित ही कानून की बेहतर जानकारी वाले व्यक्ति से मदद की जरूरत होगी, इसलिए हम चीमा से अनुरोध करते हैं कि सीबीआई और उसके दल की कानूनी बिन्दुओं पर सहायता करें।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि सीबीआई निदेशक इस मामले की सुनवाई की अगली तारीख पर अपने जांच दल के स्वरूप और इस जांच को पूरा करने के लिये आवश्यक समय के बारे में न्यायालय को बतायेंगे। पीठ ने कहा, ‘हमें इस बात पर जोर देने की आवश्यकता नहीं है कि यह मामला काफी लोक महत्व का है और सीबीआई निदेशक को इसे पूरी ईमानदारी से लेना चाहिए।’ न्यायालय ने अपने 14 मई, 2015 के आदेश का जिक्र करते हुये कहा कि हमने इसमें रंजीत सिन्हा द्वारा जांच अधिकारी या जांच दल की मौजूदगी के बगैर ही कोयला घोटाले के अभियुक्तों से मुलाकात करने को पूरी तरह अनुचित पाया है। न्यायालय ने अपने आदेश में आगे कहा कि हमारी भी इस बारे में यही राय है। इसलिए यह जांच करना जरूरी होगा कि क्या सिन्हा की अभियुक्त व्यक्तियों के साथ ऐसी किसी भी मुलाकात की जांच और बाद में ब्यूरो द्वारा दाखिल आरोपपत्र या मामला बंद करने संबंधी रिपोर्ट पर कोई प्रभाव है।

यह याचिका लंबित होने के दौरान ही न्यायालय ने जांच ब्यूरो के पूर्व विशेष निदेशक एम एल शर्मा की अध्यक्षता में समिति गठित की थी जिसे इन आरोपों पर गौर करके पिछले साल चार मार्च तक अपनी रिपोर्ट देनी थी। इसके बाद, न्यायालय ने पिछले साल 12 जुलाई को इस मामले में अपनी सुनवाई पूरी करके कहा था कि वह आदेश बाद में देगी। इससे पहले, अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने न्यायालय से कहा था कि शर्मा समिति ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में पाया है कि इस मामले के कुछ पहुंच वाले आरोपियों से सिन्हा की मुलाकात हुई थी और पहली नजर में यही संकेत मिलता है कि जांच को प्रभावित करने का प्रयास किया गया था। रोहतगी ने यह भी कहा था कि सिन्हा के सरकारी आवास की आंगतुक डायरी की प्रविष्ठियों की सच्चाई का पता तो साक्ष्य के माध्यम से न्यायालय में ही लगेगा।

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