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सबसे ज्यादा फ्रॉड कर्मचारियों पर इस सरकारी बैंक में हुआ ऐक्शन, पीएनबी है नंबर 2

कथित तौर पर कुल 13,949 अधिकारियों के ऊपर तीन सालों में बैंक फ्रॉड का मामला दर्ज किया गया या उनके ऊपर कार्रवाई की गई।

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भारत का सबसे बड़ा बैंक भारतीय स्टेट बैंक पिछले तीन वर्षों में फ्रॉड में शामिल अपने अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के मामले में पीएसयू बैंकों की सूची में सबसे ऊपर है। जिन-जिन मामलों में कार्रवाई की गई है, उसमें फ्रॉड की रकम एक लाख रुपये या उससे अधिक की रही है। वित्त मंत्रालय में राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला ने राज्यसभा में लिखित में बताया कि पिछले तीन साल (2015-2017) में फ्रॉड में शामिल होने के आरोप में भारतीय स्टेट बैंक के 1287 अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई। यह सार्वजनिक और प्राइवेट सेक्टर के बैकों के कुल कर्मचारी जिनके ऊपर बैंक फ्रॉड के मामले दर्ज हुए हैं, उसका 9 प्रतिशत है। कथित तौर पर कुल 13,949 अधिकारियों के ऊपर तीन सालों में बैंक फ्रॉड का मामला दर्ज किया गया या उनके ऊपर कार्रवाई की गई। वर्ष 2015 में 5785, वर्ष 2016 में 4360 और 2017 में 3804 कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई।

पंजाब नेशनल बैंक इस मामले में दूसरे स्थान पर है। यहां के कुल 1,127 कर्मचारी कथित तौर पर फ्रॉड में शामिल रहे हैं। यह कुल संख्या का 8 प्रतिशत है। वहीं, मणिपाल स्थित सिंडिकेट बैंक का स्थान तीसरा है। यहां के 894 कर्मचारियों के खिलाफ बैंक फ्रॉड के मामले में केस दर्ज किया गया। चौथे नंबर पर सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया है, जहां 728 कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई। पांचवे स्थान पर बैंक ऑफ बड़ौदा है, जहां 674 कर्मचारियों को रिश्वत लेने के आरोप में कार्रवाई हुई। पिछले तीन वर्षों में केनरा बैंक के 618, यूको बैंक के 555 और कॉरपोरेशन बैंक के 515 अधिकारियों पर भी कार्रवाई की गई।

यहां यह भी बता दें कि भारतीय स्टेट बैंक हाई-प्रोफाइल आरोपी और शराब कारोबारी के बंद हो चुके किशफिशर एयरलाइन को दिए गए कर्ज वापस लेने के लिए अदालती लड़ाई लड़ रहा है। वहीं, पंजाब नेशनल बैंक के कई वरिष्ठ अधिकारियों पर हीरा कारोबारी और उसके चाचा मेहुल चौकसी जो कि बैंक फ्रॉड में शामिल हैं, की मदद का आरोप लगा है।

सिंडिकेट बैंक के तत्कालीन चेयरमैन और मैनेजिंग डाॅयरेक्टर सुधीर कुमार जैन को अगस्त 2014 में सीबीआई द्वारा गिरफ्तार किया गया था। उनके ऊपर रिश्वतखोरी में शामिल होने का आरोप लगा था। बताया गया था कि वे कई प्राइवेट कंपनियों और कॉरपोरेट ग्रुप्स को फायदा पहुंचा रहे थे। वे अपने ऑफिस में प्राइवेट कंपनियों के मालिक से मिलते थे और सहयोगियों के सहारे घूस लेते थे।

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