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उद्योगों से आबाद रहे साहिबाबाद में उजड़ रहे कारखाने

दिल्ली के पास बसी अहम औद्योगिक नगरी साहिबाबाद के ज्यादातर कारखाने बंद होने के कगार पर हैं। इसका कारण मजदूरों और प्रबंधकों का आपसी विवाद है।

Author गाजियाबाद | March 5, 2016 4:52 AM
(File Pic)

दिल्ली के पास बसी अहम औद्योगिक नगरी साहिबाबाद के ज्यादातर कारखाने बंद होने के कगार पर हैं। इसका कारण मजदूरों और प्रबंधकों का आपसी विवाद है। यहां 400 कारखानों में से 190 बंद हो चुके हैं। बाकी बचे कारखानों को भी इनके मालिक बंद करने पर आमादा हैं। कुछ कारखानों के मालिकों ने सरकारी सुविधाओं के कारण पंजाब और मध्य प्रदेश में उद्योग लगाने शुरू कर दिए हैं। उनका कहना है कि प्रदेश सरकार उन्हें सुविधाएं मुहैया नहीं करा रही है। यहां पर इंजीनियरिंग, वाहन, प्लाइवुड, कागज और डिटरजेंट के सैकड़ों कारखाने हैं।
साहिबाबाद के बदलते हालात ने पूरे इलाके को बीमार बना दिया है। हर महीने एक या दो कारखाने बंद हो रहे हैं। इसका कारण बिजली न मिलना, बिक्री कर, धन व सरकारी सुविधाओं का अभाव और मजदूरों व प्रबंधकों का आपसी झगड़ा बताया जा रहा है। जिन उद्योगों में मजदूर संगठनों का प्रभाव बढ़ा है, वहां मजदूर और प्रबंधकों का झगड़ा भी बढ़ा है। प्रबंधक इलाके के 35 फीसद कारखाने बंद होने का जिम्मेदार मजदूरों को ही ठहराते हैं। उद्योगपतियों का मानना है कि मजदूर प्रबंधकों के काम में दखल देते हैं और कई बार उन पर नाजायज मांगें मानने का दबाव भी डालते हैं। इतना ही नहीं, एक मांग मंजूर होने के बाद मजदूर दूसरी मांग पर अड़ जाते हैं। ऐसे हालात में प्रबंधक कारखाने को बंद करने पर मजबूर हो जाते हैं। प्रबंधकों का मानना है कि इलाके में मैरीटेक लिमिटेड, जीनत इंटरनेशनल, ब्रामिक सूर्या, सचदेबा रबर, मोहन मैकेनिक बियर, बेबरियल इंडिया लिमिटेड, सुपर गोल्ड चैंपियन और यूनिचेल समेत सैकड़ों कारखाने बंद पड़े है। कई कंपनियों के मालिक तो अपने कारखाने बेच चुके हैं। इलाके के ज्यादातर कारखाने घाटा उठा रहे हैं। दर्जनों कारखानों की संपत्ति कुर्क हो चुकी है।

वहीं, मजदूर संगठन कारखाना मालिकों के आरोपों को बेबुनियाद मानते हैं। उनका कहना है कि प्रबंधक कारखाने को खुद घाटे में चलाते हैं और मजदूर संगठनों के नाम पर बंद कर देते हैं। मजदूरों ने बंद उद्योगों के लिए प्रबंधकों की गलत नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है।
उद्योगों के बंद होने की वजह चाहे मजदूरों की ज्यादती हो या प्रबंधकों की गलत नीतियां, लेकिन इस विवाद के कारण उद्योगों का विकास खटाई में पड़ गया है। धन के अभाव में भी उद्योग बंद हो रहे हैं। इलाके के कई उद्योग मालिकों ने बैंक से कर्ज लिया था, लेकिन उनकी किस्त अदा नहीं की गई तो बैंकों ने कारखाने ही सील कर दिए।

असल में बैंकों ने कारखानों पर काफी तगड़ा ब्याज लगा दिया है, जिसे दे पाने में कारखाने के मालिक असमर्थ हैं। ज्यादातर कारखाने ब्याज के जाल में बुरी तरह उलझ गए हैं और इसे वापस न कर पाने की वजह से उनकी संपत्ति कुर्क कर ली गई है। इस समस्या के लिए सरकार भी जिम्मेदार है। वह इन बीमार उद्योगों को आइडीवीआइ और आरबीआइ योजना के तहत मदद देती है, लेकिन इन योजनाओं को समय पर लागू नहीं किया जाता। जब तक योजनाएं लागू होती हैं, कारखाने बंद हो जाते हैं।

दूसरी ओर विद्युत परिषद ने मशीनों के आधार पर हर फैक्टरी में न्यूनतम लोड तय कर रखा है। यही नहीं, बिजली महकमा बिल के अलावा एक तय राशि भी लेता है। कभी-कभी तो कारखाना मालिक से यूनिट के हिसाब से भी रुपया वसूला जाता है। इसके अलावा बिजली के बिल पर र्इंधन शुल्क, प्रशासनिक भाड़ा और उस पर एक्साइज (वैट) का खर्च बढ़ जाता है। बिजली की आंख-मिचौली का असर भी उद्योगों पर पड़ता है। ज्यादातर उद्योग मालिकों की शिकायत बिजली की अघोषित कटौती है। कई बार बिजली की बेवक्त कटौती से कारखानों में पड़ा माल भी खराब हो जाता है। बिक्री कर महकमे के बेवजह छापे भी इन कारखानों के बंद होने के लिए जिम्मेदार हैं। साहिबाबाद के उद्योग मालिकों का कहना है कि अगर नोएडा उद्योग नगरी के मुताबिक यहां सुविधाएं मुहैया कराई जाएं तो उद्योगपति अपने कारखाने बंद नहीं करेंगे।

उद्योगपतियों का कहना है कि बिक्री कर में ज्यादा समय तक छूट न देने के कारण कारखानों के मालिकों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। दूसरे राज्यों में आयकर में लंबे समय तक छूट दी जाती है। पंजाब में सभी सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं, जबकि उत्तर प्रदेश की औद्योगिक नगरी साहिबाबाद में ऐसा नहीं है। इस वजह से यहां के उद्योगपति पलायन कर रहे हैं। ज्यादातर उद्योगपतियों का ध्यान नोएडा और ग्रेटर नोएडा में लगी फैक्ट्रियों को मुहैया कराई गई सुविधाओं पर है, जहां कारखाना मालिकों की शिकायत सुनने वाले अधिकारी हैं। यहां तो कोई अधिकारी उद्योगपतियों की शिकायत सुनने को ही तैयार नहीं है, उसका निवारण तो दूर की बात है।

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