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रिजर्व बैंक रेपो रेट: घटती ब्याज दर, लुढ़कता बाजार

रिजर्व बैंक भविष्य को लेकर उम्मीद जता रहा है और कह रहा है कि जो घोषणाएं की जा रही हैं, उनका असर सामने आते समय लगेगा। कम से कम अगले छह महीने तक और इंतजार करना होगा।

Author Published on: October 8, 2019 6:07 AM
आरबीआइ के गवर्नर शक्तिकांत दास व मौद्रिक समीक्षा कमेटी के अन्य सदस्य। फोटो : आरबीआइ ट्विटर से

दीपक रस्तोगी

संभावना थी ही। रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया (आरबीआइ) ने अपनी हालिया मौद्रिक बैठक में एक बार फिर रेपो रेट (जिस ब्याज दर पर रिजर्व बैंक से वाणिज्यिक बैंक स्वल्पमियादी कर्ज लेते हैं।) कम करने का ऐलान किया। मौजूदा वित्त वर्ष में इसे लेकर लगातार पांच बार रिजर्व बैंक ने ऐसा किया है। रेपो रेट में कुल कमी अब 135 बेसिस प्वाइंट हो गई है। फिर भी, शीर्ष बैंक द्वारा कर्ज नीति के ऐलान के साथ ही बाजार क्यों सीधे 434 प्वाइंट लुढ़क गया इसका जवाब सीधा सा ही, पर वजहें नीतिगत खामियों की ओर इशारा करती हैं।

कटौती बनाम जीडीपी पूर्वाभास
एक ओर, रिजर्व बैंक ने अर्थव्यवस्था में जान फूंकने की बात करते हुए अपने रेपो रेट में कटौती की और कहा कि इससे बैंकिंग सेक्टर की ब्याज दरें कम होंगी, लोगों में कर्ज की मांग बढ़ेगी और बाजार में इससे आॅटो या गृह सेक्टर में खरीददारी बढ़ेगी। लेकिन साथ ही, रिजर्व बैंक ने मौजूदा वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि का अनुमान घटा दिया। अपने पिछले अनुमान 6.9 फीसद में संशोधन करते हुए इसे 6.1 तक सीमित रहने का अनुमान जता दिया। इससे निवेशकों की चिंता बढ़ी और रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट घटाने की कवायद पर पानी फिर गया। जानकारों का कहना है कि अगर विकास का पूवार्नुमान घटाना ही है तो यह अर्थव्यवस्था में जान फूंकने की कवायद नहीं हो सकती।

बैंकिंग क्षेत्र के सवाल
रिजर्व बैंक की ताजा कवायद के बाद स्टेट बैंक इंडिया की शोध शाखा इकोरैप ने अपनी रिपोर्ट में सवाल खड़े किए कि इससे अर्थव्यवस्था को कितनी गति मिल पाएगी। बीते छह महीने में बैंकों ने ब्याज दरों में लगातार कटौती की है, लेकिन कर्ज की मांग में बढ़ोतरी नहीं हुई है। बाजार में तरलता लगातार कम हुई है। तरलता तब आएगी, जब बाजार में खरीददारी तेज होगी। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा। क्योंकि बाजार में अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है, आर्थिक विकास दर के पूवार्नुमान से यह स्थिति बढ़ी ही है।

फायदा रोके रहने का बैंकों पर आरोप
बैंकिंग सेक्टर पर अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि रिजर्व बैंक तो ब्याज दरों में कटौती पर कटौती किए जा रहा है, लेकिन बैंक उसका पूरा फायदा ग्राहकों तक नहीं पहुंचा रहे। ऐसे में उद्योग जगत भी नए प्रोजेक्ट या पुराने प्लांट के विस्तार से हिचकता रहा है। 2014 के 8 फीसद से रेपो रेट घटकर अब 5.75 फीसदी तक आ चुका है। दूसरी तरफ, देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक ने इस बीच अपने कर्ज की ब्याज दर में सिर्फ 0.6 फीसद की कटौती की है और यह 10.15 फीसद से घटकर 9.55 फीसद तक पहुंचा है। इस स्थिति पर वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक ने कभी बैंकों को कुछ नहीं कहा। बैंकों का तर्क रहता है कि रेपो रेट कटौती का फायदा ग्राहकों और उद्योग तक पहुंचाने के पहले उन्हें ऊंचे ब्याज दर वाले जमा योजनाओं का समायोजन करना है।

उम्मीदों की बात
रिजर्व बैंक भविष्य को लेकर उम्मीद जता रहा है और कह रहा है कि जो घोषणाएं की जा रही हैं, उनका असर सामने आते समय लगेगा। कम से कम अगले छह महीने तक और इंतजार करना होगा। आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास का कहना है कि शीर्ष बैंक आर्थिक विकास दर को लेकर काम कर रहा है और जरूरत पड़ेगी तो रेपो रेट में और कटौती की जाएगी। लेकिन आलोचकों का कहना है कि ठोस घोषणाओं के मामले में शीर्ष बैंक दिशाहीन दिख रहा है। रिजर्व बैंक तो अब सरकार की नीतियों के परिपूरक के हिसाब से काम कर रहा है। बैंकिंग क्षेत्र के जानकार बीके दत्त कहते हैं कि चार बार ब्याज दरों में कटौती का कोई असर नहीं, लेकिन सरकार अगर आयकर और अन्य करों में कटौती करे तो लोगों के पास खर्च करने को रुपए होंगे और बाजार में कुछ तो तरलता आएगी। उपभोक्ता वर्ग को राहत पहुंचाने की जरूरत है, न कि कॉरपोरेट को।

एक क्षेत्र के बाद दूसरा क्षेत्र संकट में है, नोटबंदी निरंतर आर्थिक आपदा साबित हो रही है। जीएसटी का भी नकारात्मक असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। नतीजतन अर्थव्यवस्था की विकास दर में गिरावट बनी हुई है। आरबीआइ और सरकार को असल वजहें समझने की कोशिश करनी चाहिए।
-रथिन रॉय, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य

सरकार ने अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलावों के लिए कई उपाय किए हैं। हालांकि, इनमें से ज्यादातर उपाय आपूर्ति पक्ष का दबाव कम करने वाले हैं। मुख्य चुनौती मांग पैदा करने की है।
– शमिका रवि, अर्थशास्त्री

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