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बैंकों के एजेंट के तौर पर काम नहीं कर सकता RBI, छह महीने के लिए और बढ़े मोराटोरियम, SC में उठी मांग

कर्जधारकों का पक्ष रखते हुए सीनियर एडवोकेट राजीव दत्ता ने कहा कि हम लोन में डिफॉल्ट की बात नहीं कर रहे हैं। ईएमआई पर मोराटोरियम का अर्थ है कि कैश फ्लो के संकट की स्थिति में राहत देना। बैंकों की ओर से इसे घाटा कैसे कहा जाता सकता है?

moratorium supreme courtमोराटोरियम के दौरान ब्याज वसूली पर 3 सितंबर को भी होगी सुनवाई

लोन मोराटोरियम की अवधि के दौरान ब्याज पर राहत देने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को कोई फैसला नहीं हो सका। शीर्ष अदालत ने अब गुरुवार को भी सुनवाई जारी रखने का फैसला लिया है। गुरुवार को दोपहर दो बजे केस की फिर सुनवाई शुरू होगी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता ने कहा कि ब्याज पर ब्याज वसूली करना कर्जधारक को डिफॉल्टर समझने जैसा है। उन्होंने कहा कि मोराटोरियम कैश फ्लो के संकट को देखते हिए राहत देने का फैसला था, लेकिन इसने दोहरी मार की है। यही नहीं अधिवक्ता राजीव दत्ता ने आरबीआई पर सवाल उठाते हुए कहा कि आरबीआई की भूमिका फाइनेंशल रेगुलेटर की है, वह बैंकों के एजेंट के तौर पर काम नहीं कर सकता है, जैसा कर रहा है। ऐसा लग रहा है कि बैंक आरबीआई के पीछे छिप रहे हैं और कोरोना के इस संकट काल में भी मुनाफा कमाने में जुटे हैं।

कर्जधारकों का पक्ष रखते हुए सीनियर एडवोकेट राजीव दत्ता ने कहा कि हम लोन में डिफॉल्ट की बात नहीं कर रहे हैं। ईएमआई पर मोराटोरियम का अर्थ है कि कैश फ्लो के संकट की स्थिति में राहत देना। बैंकों की ओर से इसे घाटा कैसे कहा जाता सकता है? उन्होंने कहा कि कोरोना काल में लोग संकट के दौर से गुजर रहे हैं और मोराटोरियम की स्कीम उनके लिए दोहरे झटके जैसी साबित हो रही है। दत्ता ने कहा कि ब्याज पर ब्याज लगाना प्रथमदृष्ट्या गलत है और बैंक इसकी वसूली नहीं कर सकते।

CREDAI का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता आर्यमान सुंदरम ने कहा कि कर्जधारकों से ब्याज पर ब्याज वसूलना गलत है और इससे आने वाले समय में एनपीए का रिस्क और बढ़ सकता है। यही नहीं उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात को देखते हुए मोराटोरियम की अवधि 6 महीने के लिए और बढ़ाई जानी चाहिए। इससे पहले केंद्र सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि मोराटोरियम की अवधि के दौरान ब्याज माफ करना या फिर ब्याज पर ब्याज खत्म करना फाइनेंस के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ है।

यही नहीं सरकार ने कहा था कि यदि ऐसा किया जाता है तो यह उन लोगों के साथ अन्याय करने जैसा होगा, जो लगातार अपने कर्ज की किस्तें अदा कर रहे हैं। सरकार ने अपने एफिडेविट में कहा था कि ऐसा करना नियमित कर्ज चुकाने वालों की कीमत पर ऐसे लोगों का फेवर करना होगा, जिन्होंने मोराटोरियम की सुविधा ली है। यह फाइनेंस के मूलभूत सिद्धांत के खिलाफ है और नियमित कर्ज चुकाने वालों के साथ भी अन्याय करने सरीखा है।

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