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शेयरधारक का आरोप- हमारी मंजूरी के बिना भाई मुकेश को संपत्‍ति बेच रहे अनिल अंबानी, ट्रिब्‍यूनल ने जारी रखी रोक

रिलायंस कम्यूनिकेशन के प्रवक्ता ने सोमवार को दिए एक बयान में कहा कि कंपनी अपने उधारदाताओं के हितों की रक्षा करने के लिए इस स्टे से बचने के लिए नेशनल कंपनी लॉ एपैलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) में अपील करेगी। प्रवक्ता ने बताया कि एनसीएलटी द्वारा लगाया गया स्टे सिर्फ रिलायंस कम्यूनिकेशन के टावर और फाइबर पर लागू होता है। यह स्टे कंपनी के स्पेक्ट्रम, एमसीएन और रियल स्टेट पर लागू नहीं होता है।

रिलायंस कम्यूनिकेशन अपने टावर और ऑप्टिक फाइबर संपत्ति को रिलायंस जियो को बेचने की कोशिश कर रही है। यह सौदा करीब 8000 करोड़ रुपए का होगा, जिसमें से 5000 करोड़ सिर्फ टावर और जमीन के लिए होंगे। वहीं स्पेक्ट्रम वगैरह को मिलाकर पूरी डील कुल 25000 करोड़ रुपए की है। (image source- Reuters)

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ने रिलायंस इंफ्राटेल द्वारा अपनी संपत्ति किसी तीसरी पार्टी को बेचने पर अगले आदेश तक स्टे लगा दिया है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के आदेश के बाद रिलायंस इंफ्राटेल की पेरेंट कंपनी रिलायंस कम्यूनिकेशन को अपने टावर और फाइबर रिलायंस जियो को बेचने की डील खटाई में पड़ सकती है। बता दें कि रिलायंस कम्यूनिकेशन के उधारदाताओं ने इस डील की डेडलाइन मार्च तक तय की थी। रिलायंस कम्यूनिकेशन के प्रवक्ता ने सोमवार को दिए एक बयान में कहा कि कंपनी अपने उधारदाताओं के हितों की रक्षा करने के लिए इस स्टे से बचने के लिए नेशनल कंपनी लॉ एपैलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) में अपील करेगी। प्रवक्ता ने बताया कि एनसीएलटी द्वारा लगाया गया स्टे सिर्फ रिलायंस कम्यूनिकेशन के टावर और फाइबर पर लागू होता है। यह स्टे कंपनी के स्पेक्ट्रम, एमसीएन और रियल स्टेट पर लागू नहीं होता है।

एनसीएलटी की मुंबई बेंच के बीएसवी प्रकाश कुमार और रविकुमार दुरासामी ने रिलायंस इंफ्राटेल पर स्टे का ऑर्डर पास किया है। दरअसल मॉरिशस की एचएसबीसी डेजी इन्वेस्टमेंट ने रिलायंस इंफ्राटेल में माइनर शेयरहोल्डर होने के कारण, कंपनी की संपत्ति की बिक्री का विरोध किया था। डेजी इन्वेस्टमेंट का कहना है कि उनकी मंजूरी के बिना रिलायंस इंफ्राटेल अपनी संपत्ति बेच रही है, जो कि सेक्शन 397 और 398 के तहत माइनोरिटी शेयरहोल्डर का उत्पीड़न है। उल्लेखनीय है कि एचएसबीसी डेजी इन्वेस्टमेंट ने जुलाई 2007 में रिलायंस इंफ्राटेल में 1100 करोड़ रुपए यानि कि 5 प्रतिशत का इन्वेस्ट किया था। एनसीएलटी ने रिलायंस कम्यूनिकेशन को अगले 3 हफ्तों में अपना जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है।

गौरतलब है कि रिलायंस कम्यूनिकेशन अपने टावर और ऑप्टिक फाइबर संपत्ति को रिलायंस जियो को बेचने की कोशिश कर रही है। यह सौदा करीब 8000 करोड़ रुपए का होगा, जिसमें से 5000 करोड़ सिर्फ टावर और जमीन के लिए होंगे। वहीं स्पेक्ट्रम वगैरह को मिलाकर पूरी डील कुल 25000 करोड़ रुपए की है, जिसके मार्च तक होने की उम्मीद थी, लेकिन अब एनसीएलटी के स्टे के कारण यह डील परेशानी में आ गई है। बता दें कि रिलायंस कम्यूनिकेशन को अपने 35 उधारदाताओं को करीब 45000 करोड़ रुपए चुकाना है। अब यदि रिलायंस कम्यूनिकेशन और रिलायंस जियो की डील नहीं हो पाती है तो रिलायंस कम्यूनिकेशन के उधारदाता अपना पैसा ना मिलने की स्थिति में कंपनी को दिवालिया घोषित करा सकते हैं।

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