भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इस समय एक अजीब मॉनेटरी-पॉलिसी सिरदर्द का सामना कर रहा है। बैंकिंग सिस्टम में बहुत ज्यादा पैसा या लिक्विडिटी है, बैंकिंग सिस्टम की लिक्विडिटी 3 सितंबर को लगभग 10.3 लाख करोड़ रुपये के चार साल के सबसे ऊंचे लेवल पर पहुंच गई, जो मई 2022 के बाद इसका सबसे ऊंचा लेवल है।
हाल ही में स्वैप सुविधा के जरिए बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा का आना और आरबीआई के विदेशी मुद्रा ऑपरेशन के जरिए जारी लिक्विडिटी के कारण, रुपये के फंड का एक बड़ा पूल बन गया है, जो निवेश के लिए तुलनात्मक रूप से सीमित रास्तों का पीछा कर रहा है।
जनसत्ता के सहयोगी द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, क्वांटम AMC की इक्विटी फंड मैनेजर स्नेहा पांडे ने कहा कि जहां कोर लिक्विडिटी 10 लाख करोड़ रुपये को पार कर गई, वहीं अगस्त में रोजाना का औसत सरप्लस 3.67 लाख करोड़ रुपये था, जो जुलाई के Rs 1.07 लाख करोड़ से तीन गुना से भी ज्यादा है।
केंद्रीय बैंक को अब ब्याज दरों में तेज बढ़ोतरी किए बिना या सरकारी सिक्योरिटीज मार्केट को अस्थिर किए बिना इस अतिरिक्त लिक्विडिटी को निकालना होगा।
बैंकिंग सिस्टम में बहुत ज्यादा लिक्विडिटी आम तौर पर ओवरनाइट मनी-मार्केट रेट्स पर दबाव डालती है, जिससे वे रेपो रेट से नीचे जा सकते हैं, जब तक कि आरबीआई ज्यादा लिक्विडिटी को एक्टिवली एब्ज़ॉर्ब न कर ले। लगातार कम लिक्विडिटी की स्थिति भी महंगाई का दबाव बढ़ा सकती है।
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यह अजीब स्थिति ऐसे समय में आई है जब ग्लोबल सेंट्रल बैंक महंगाई को रोकने के लिए रेट्स को ऊंचा रख रहे हैं या सावधानी से सख्ती कर रहे हैं और आरबीआई की मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी के सदस्यों ने संकेत दिया है कि, चूंकि हेडलाइन महंगाई Q3 2026-27 में 5.9% तक पहुंचने का अनुमान है, इसलिए साल के दौरान “बढ़ोतरी का मामला सामने आ सकता है”।
केयरएज रेटिंग्स ने कहा, “आने वाले त्योहारों के मौसम में सर्कुलेशन में करेंसी में बढ़ोतरी और फॉरवर्ड मार्केट में आरबीआई की शॉर्ट डॉलर पोजीशन की मैच्योरिटी को एडजस्ट करने के बाद भी, हमें उम्मीद है कि आरबीआई द्वारा कोई लिक्विडिटी मैनेजमेंट ऑपरेशन न होने पर कोर लिक्विडिटी अगस्त के मध्य तक 8.1 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर दिसंबर के अंत तक 13-14 लाख करोड़ रुपये के करीब हो जाएगी।”
DBS बैंक की सीनियर इकोनॉमिस्ट और ED राधिका राव ने कहा, “स्वैप अरेंजमेंट को देखते हुए, ये इनफ्लो पहले से ही मौजूद रुपये की लिक्विडिटी को और बढ़ा देंगे, जो इस महीने चार साल के हाई पर थी, जिससे ओवरनाइट रेट्स कम हो गए।”
यह बाढ़ तब आई जब आरबीआई की स्पेशल US डॉलर-रुपया फॉरेक्स स्वैप फैसिलिटी ने 31 अगस्त तक 136.377 बिलियन डॉलर का फॉरेन-एक्सचेंज इनफ्लो खींचा। FCNR(B) डिपॉजिट्स का इस मोबिलाइजेशन में सबसे बड़ा हिस्सा 127.226 बिलियन डॉलर था।
एक फंड मैनेजर ने कहा, “इन डॉलर्स को कन्वर्ट करने पर, सिस्टम में रुपये आए और इन डिपॉजिट्स को सीआरआर और SLR से छूट मिलने का मतलब था कि लिक्विडिटी बिना किसी रुकावट के पहुंची।”
कैपिटल अकाउंट और ओवरऑल बैलेंस ऑफ पेमेंट्स को मजबूत करने के अलावा, इन बड़े इनफ्लो से डोमेस्टिक लिक्विडिटी में भी काफी बढ़ोतरी होने की संभावना है। हालांकि, इस असर का कुछ हिस्सा सीजनल करेंसी डिमांड और आरबीआई की मैच्योर हो रही फॉरवर्ड बुक से कम हो सकता है।
केयरएज रेटिंग्स ने कहा, “हमारा अनुमान है कि त्योहारों के मौसम में सीज़नल तेजी के बीच, दिसंबर तक करेंसी इन सर्कुलेशन (CiC) जून के लेवल से लगभग 1.1 लाख करोड़ रुपये बढ़ सकती है।”
इसके अलावा, फॉरवर्ड मार्केट में आरबीआई की शॉर्ट पोजिशन की मैच्योरिटी से लगभग 3 लाख करोड़ रुपये का एक्स्ट्रा लिक्विडिटी ड्रैग हो सकता है, जिसमें लगभग 22 बिलियन डॉलर की शॉर्ट-फॉरवर्ड बुक तीन महीने के अंदर मैच्योर हो जाएगी।
डिपॉज़िट ग्रोथ से होने वाली सीआरआर बढ़ोतरी से कोर लिक्विडिटी में 70,000 करोड़ रुपये की और कमी आनी चाहिए।
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ज्यादा पैसे को मैनेज करने के लिए आरबीआई के टूल्स
ग्लोबल सेंट्रल बैंक ज्यादातर रेट्स को ऊंचा रखने या सावधानी से सख्त करने की प्लानिंग कर रहे हैं क्योंकि महंगाई, खासकर एनर्जी और जियोपॉलिटिकल झटकों से कमजोर ग्रोथ के बावजूद टारगेट से ऊपर बनी हुई है।
अगर इससे महंगाई का दबाव बढ़ने लगता है और मार्केट रेट्स पॉलिसी रेट से बहुत नीचे चले जाते हैं, तो आरबीआई लिक्विडिटी को बहुत ज्यादा ढीला छोड़ने का रिस्क नहीं उठा सकता।
राव ने कहा कि लिक्विडिटी में संभावित उछाल को खत्म करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। राव ने कहा, “निकट-अवधि के विकल्पों में टेम्पररी कैश रिज़र्व रेश्यो (सीआरआर) में बढ़ोतरी या 2023 में शुरू किया गया इंक्रीमेंटल सीआरआर शामिल है। हालांकि इसका तुरंत असर होगा, लेकिन इस तरह के कदम को आरबीआई के इन डिपॉजिट को सीआरआर और SLR की जरूरतों से बाहर रखने के पहले के फैसले को असरदार तरीके से खत्म करने के तौर पर देखा जा सकता है।”
पहले भी आरबीआई ने हालात के हिसाब से सिस्टम से ज्यादा लिक्विडिटी निकालने के लिए कई टूल्स का इस्तेमाल किया है, जिसका बॉन्ड और फॉरेक्स मार्केट पर अलग-अलग असर पड़ा है।
केयरएज ने कहा, “मौजूदा हालात में आरबीआई शुरू में उभरती हुई सरप्लस लिक्विडिटी को एब्जॉर्ब करने के लिए लंबे समय के VRRR ऑपरेशन और OMO सेल्स सहित लिक्विडिटी मैनेजमेंट टूल्स का मिक्स इस्तेमाल कर सकता है। अगर सरप्लस लगातार बना रहता है, तो इन उपायों के बाद इंक्रीमेंटल कैश रिज़र्व रेश्यो (I-सीआरआर) जैसे और लिक्विडिटी-एब्जॉर्प्शन टूल्स का इस्तेमाल किया जा सकता है।”
बचाव की पहली लाइन पहले से ही काम कर रही है। पांडे ने कहा, “आरबीआई लगातार वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) ऑक्शन चला रहा है, जिसमें उसी दिन 7 दिन का 6 लाख करोड़ रुपये का ऑपरेशन और एक ओवरनाइट 4 लाख करोड़ रुपये का ऑपरेशन शामिल है, इसके बाद लगातार दिनों में 5 लाख करोड़ रुपये और 6 लाख करोड़ रुपये के ओवरनाइट ऑपरेशन होंगे।”
कागज़ पर सीआरआर बढ़ाना ड्यूरेबल लिक्विडिटी निकालने का सबसे साफ तरीका है। पांडे ने कहा कि पिछले साल की 100 bps कटौती के बाद आज NDTL का 3.00% होने पर आरबीआई के पास इसे बढ़ाने के लिए काफी जगह है और सीआरआर के ज़रिए NDTL के 2% के बराबर लिक्विडिटी एब्जॉर्ब करने से सिस्टम से बहुत बड़ी और ड्यूरेबल मात्रा निकल जाएगी।
ओपन मार्केट ऑपरेशन या OMO सेल्स, एक कैलिब्रेटेड बीच का रास्ता है, जो सिद्धांत रूप से रिवर्सिबल, मार्केट-प्राइस्ड और अगर अच्छी तरह से कम्युनिकेट किया जाए तो स्टांस-न्यूट्रल है। पिछली सर्दियों में ही OMO खरीद के ज़रिए 2 लाख करोड़ रुपये की ड्यूरेबल लिक्विडिटी डालने के बाद, आरबीआई अब आराम से रिवर्स ऑपरेशन चला सकता है।
इस हद तक, अगर सेंट्रल बैंक स्पॉट मार्केट में धीरे-धीरे डॉलर बेचता रहता है और फॉरवर्ड-बुक शॉर्ट्स को मैच्योर होने देता है, तो इससे FY27 के आखिर तक एक्स्ट्रा लिक्विडिटी कम करने में भी मदद मिलेगी।
यह तय करना भी जरूरी होगा कि सेंट्रल बैंक H2FY27 में पॉलिसी को सख़्त करता है या नहीं, ऐसे में कॉल रेट को रेपो रेट की ओर ले जाने के लिए ओवरऑल लिक्विडिटी को सख्त करना होगा।
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