क्रोनी कैपिटलिज्म पर चल रही बहस के बीच अर्थशास्त्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा कि किसी उद्योगपति या कंपनी की सफलता को निशाना बनाने के बजाय उन नीतियों पर ध्यान देना चाहिए, जो कथित तौर पर विशेष हितों को लाभ पहुंचाती हैं।
हाल ही में द इंडियन एक्सप्रेस के आइडिया एक्सचेंज कार्यक्रम में नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और वरिष्ठ अर्थशास्त्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया से कांग्रेस के उस आर्थिक नैरेटिव पर सवाल पूछा गया, जिसमें राहुल गांधी अक्सर आरोप लगाते हैं कि सरकार की नीतियां कुछ बड़े उद्योग समूहों (विशेष रूप से अंबानी और अडानी) को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई जा रही हैं। साथ ही उनसे यह भी पूछा गया कि क्या उन्होंने इस मुद्दे पर कभी कांग्रेस नेतृत्व से चर्चा की है और वह इस बहस को किस तरह देखते हैं।
इसके जवाब में अहलूवालिया ने कहा कि उन्होंने इस विषय पर किसी भी राजनीतिक दल के नेता से चर्चा नहीं की है, इसलिए वह इस राजनीतिक बहस का हिस्सा नहीं हैं। हालांकि एक अर्थशास्त्री के तौर पर उन्हें क्रोनी कैपिटलिज्म पर होने वाली चर्चा का मौजूदा स्वरूप पूरी तरह तर्कसंगत नहीं लगता।
उन्होंने कहा कि यदि कोई नीति वास्तव में कुछ चुनिंदा कंपनियों या समूहों को अनुचित लाभ पहुंचा रही है, तो उस नीति की आलोचना और समीक्षा होनी चाहिए। लेकिन केवल इसलिए कि कुछ उद्योगपतियों ने बहुत बड़े और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली कारोबारी समूह खड़े कर लिए हैं, यह मान लेना उचित नहीं होगा कि उनकी पूरी सफलता सिर्फ क्रोनी कैपिटलिज्म का परिणाम है।
अहलूवालिया के मुताबिक, हालांकि यह जरूर संभव है कि कुछ नीतियों में हेरफेर करके विशेष हितों को फायदा पहुंचाया जा रहा हो। यदि ऐसा है, तो यह एक गंभीर मुद्दा है और उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति की आलोचना करनी चाहिए।
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क्या मजबूत रुपया हमेशा मजबूत अर्थव्यवस्था की निशानी होता है? योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का मानना है कि मुद्रा की ताकत को राष्ट्रवाद का प्रतीक मानना सही नहीं है। उनका तर्क है कि मुद्रा की मजबूती अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाती है, न कि अत्यधिक हस्तक्षेप के माध्यम से कृत्रिम रूप से लागू की जानी चाहिए।
हाल ही में द इंडियन एक्सप्रेस के आइडिया एक्सचेंज कार्यक्रम में बोलते हुए अहलूवालिया ने कहा कि भारत को हर हाल में मजबूत रुपये का लक्ष्य नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने ऐसे समय में यह टिप्पणी की है जब वैश्विक तेल कीमतों, विदेशी निवेश निकासी, डॉलर की बढ़ती मांग और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है।
अहलूवालिया ने कहा कि रुपये की चाल को बड़े आर्थिक हालात का सिग्नल समझना चाहिए, न कि किसी ऐसे टारगेट के तौर पर जिसे हर कीमत पर बचाया जाए। यहां पढ़ें पूरी खबर…
