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प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना: घट रही किसानों की संख्‍या, बढ़ रहा बीमा कंपनियों का राजस्‍व

नरेंद्र मोदी की सरकार ने वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की घोषणा की थी। शुरुआती साल में किसानों ने दिलचस्‍पी दिखाई, लेकिन दावे की रकम हासिल करने में आने वाली कठिनाइयों को देखते हुए इस बीमा योजना का लाभ लेने वाले किसानों की तादाद लगातार कम होती जा रही है। हालांकि, बीमा कंपनियों के राजस्‍व में लगातार वृद्धि हो रही है।

Author नई दिल्‍ली | January 11, 2019 3:12 PM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटोः पीटीआई)

किसानों को राहत पहुंचाने के लिए मोदी सरकार ने अप्रैल 2016 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लॉन्‍च की थी। आने वाले कुछ वर्षों में अधिकांश किसानों को इसके दायरे में लाने का लक्ष्‍य रखा गया था, ताकि प्रतिकूल परिस्थितियों में किसानों को उचित आर्थिक मदद मुहैया कराई जा सके। फसल बीमा योजना के जरिये मोदी सरकार को किसान हितैषी के तौर पर भी पेश किया गया। इस योजना के तहत कई तरह के रिस्‍क को कवर करने की बात कही गई है। साथ ही आने वाले समय में इसका दायरा भी बढ़ाने का वादा किया गया। किसानों को प्रीमियम के तौर पर इंश्‍योर्ड राशि का 2 फीसद (खरीफ फसलों के लिए) और 1.5 प्रतिशत (रबि फसलों के लिए) देने का प्रावधान किया गया है। हालांकि, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। जिस वर्ष इसे लागू किया गया उस साल 4 करोड़ से ज्‍यादा किसानों ने योजना के तहत पंजीकरण कराया था। लेकिन, जमीनी तैयारी सही तरीके से होने के कारण पिछले दो वर्षों से बीमा का लाभ लेने वाले किसानों की तादाद में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। इसके बावजूद बीमा कंपनियों का राजस्‍व साल-दर-साल के हिसाब से बढ़ता जा रहा है।

बीमा कंपनियों का लगातार बढ़ रहा राजस्‍व: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के प्रति किसानों की दिलचस्‍पी लगातार कम होती जा रही है। वर्ष 2016 में जब इस योजना को पूरे जोरशोर के साथ लॉन्‍च किया गय था तो उस साल 4 करोड़ से किसानों ने फसलों का बीमा कराया था। फसल बर्बाद या नष्‍ट होने की स्थिति में दावा ठोकने वाले किसानों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। दरअसल, पहले नष्‍ट फसलों के मूल्‍यांकन में काफी समय लग जाता और बाद में बीमा कंपनियों की तरफ से दावे की राशि देने में लेट-लतीफी होती है। लंबी कागजी कार्रवाई के चलते फसल बीमा योजना के प्रति किसानों की दिलचस्‍पी लगातार कम होती जा रही है। वर्ष 2016 में फसल बीमा योजना लेने वाले किसानों की तादाद 4 करोड़ से ज्‍यादा थी। साल 2017 में यह आंकड़ा 3.48 करोड़ और वर्ष 2018 में 3.33 करोड़ तक पहुंच गया। वहीं, बीमा कंपनियों के राजस्‍व में लगातार वृद्धि हो रही है। वर्ष 2015-16 में फसल बीमा योजना से बीमा कंपनियों ने 5,614 करोड़ रुपए जुटाए थे। वहीं, साल 2016-17 में 22,362 करोड़ और वर्ष 2017-18 में 25,046 करोड़ रुपए का राजस्‍व संग्रह किया गया।

बीमा के बगैर लोन देने में आनाकानी: फसल बीमा योजना के कारण किसानों को एक नई समस्‍या से दो-चार होना पड़ रहा है। कृषि लोन के लिए अप्‍लाई करने वाले किसानों के साथ बैंक की ओर से कथित तौर पर मनमानी की जा रही है। ‘मिंट’ में प्राशित रिपोर्ट के अनुसार, बैंकों की ओर से किसानों को जबरन फसल बीमा योजना दिया जा रहा है। दरअसल, कृषि लोन लेने वाले किसानों की राशि से बीमा का प्रीमियम काट लिया जा रहा है। यहां तक कि बैंक किसानों को प्रीमियम भुगतान की रसीद भी नहीं दे रहे हैं। लोन लेने वाले किसानों से यह भी नहीं पूछा जाता है कि वह फसल बीमा योजना लेना चाहते हैं या नहीं। ऐसे में कृषि लोन बैंकों के लिए कर्ज को सुरक्षित करने का आसान जरिया बन गया है। दूसरी तरफ, फसल नष्‍ट होने पर किसान नई समस्‍या में घिर जाते हैं कि दावे के लिए वह किससे संपर्क साधें। आमतौर पर बीमा कंपनियों के प्रतिनिधि जमीन पर दिखते ही नहीं हैं, जिनसे संपर्क साधा जा सके।

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