Nirma: borrowed 1000 bucks, hawk homemade washing powder on bicycle, here is how Karsanbhai Patel made RS 27000 crore company - साइकिल पर वॉशिंग पाउडर बेच खड़ी कर दी 2500 करोड़ टर्नओवर वाली कंपनी, ऐसे सबकी पसंद बना 'निरमा' - Jansatta
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साइकिल पर वॉशिंग पाउडर बेच खड़ी कर दी 27000 करोड़ टर्नओवर वाली कंपनी, ऐसे सबकी पसंद बना ‘निरमा’

80 के दशक में पैदा होने वाली जनरेशन के लिए कपड़ा धोने वाले साबुन का मतलब 'निरमा' था। 1982 में टीवी, रेडियो पर विज्ञापन आना शुरू हुआ- 'दूध सी सफेदी, निरमा से आई... वॉशिंग पाउडर निरमा, वॉशिंग पाउडर निरमा...' और घर-घर में यह साबुन एंथम बन गया। आप भी उसी जनरेशन के आस-पास के हैं तो यह बात बखूबी समझते होंगे।

दूसरी तस्वीर 2008 की है। निरमा फाउंडेशन ट्रस्ट की ओर से करसनभाई पटेल एक मेधावी स्कूली बच्ची को पुरस्कार देते हुए। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

80 के दशक में पैदा होने वाली जनरेशन के लिए कपड़ा धोने वाले साबुन का मतलब ‘निरमा’ था। 1982 में टीवी, रेडियो पर विज्ञापन आना शुरू हुआ- ‘दूध सी सफेदी, निरमा से आई… वॉशिंग पाउडर निरमा, वॉशिंग पाउडर निरमा…’ और घर-घर में यह साबुन एंथम बन गया। आप भी उसी जनरेशन के आस-पास के हैं तो यह बात बखूबी समझते होंगे। आज की करीब 27000 करोड़ रुपये टर्नओवर की कंपनी निरमा के अतीत में जाएं तो आपका परिचय एक ऐसे शख्स से होगा जिसने सरकारी नौकरी छोड़कर खुद साबुन बनाया और फिर साइकिल से घर-घर जाकर उसे बेचना शुरू किया। इसके लिए भी उसे 1000 रुपये परिवार के लोगों और दोस्तों से उधार मांगकर जुटाने पड़े थे। वह शख्स करसनभाई पटेल हैं, जोकि एक लिविंग लेजेंड हैं और इनकी सफलता का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि एकबार बाजार की प्रतिद्वंदी कंपनी हिंदुस्तान लीवर के चेयरमैन केके दादीसेठ ने अर्न्स्ट एंड यंग द्वारा आजीवन उपलब्धि उद्यमिता पुरस्कार के लिए करसनभाई के नाम की सिफारिश की थी और यह उपलब्धि उनके हाथ लगी थी।

करीब 36 वर्ष पहले साबुन के काम में हाथ डालने वाले करसनभाई पटेल रसायन विज्ञान के छात्र रह चुके थे। केमिकल्स के बारे में अच्छी समझ काम आई और बाजार में बिकने वाले महंगे विदेशी साबुन का तोड़ ढूढ़ निकाला। साबुन बनाने से पहले करसनभाई पटेल ने 6 वर्षों तक कॉटन मिल और गुजरात सरकार के खनन और भूविज्ञान विभाग में नौकरी की थी। नौकरी छोड़कर कारोबार शुरू करना तब आसान नहीं था। भगवद्गीता का ज्ञान- ‘कर्म करते रहो, फल की चिंता न करो’ ने हौसला और दृढ़संकल्प दिया और वह काम करते गए। शुरूआती दिनों में करसनभाई पटेल हर रविवार अपना बनाया साबुन साइकिल पर लाद घर-घर जाकर बेचते थे। उनके शुरुआती ग्राहकों में परिचित, दोस्त कुछ अजनबी लोग होते थे। एक महीने में वह बमुश्किल 500 किलोग्राम साबुन बेच पाते थे, आज उनके प्लान्ट में रोजाना हजारों टन साबुन तैयार होता है।

निरमा की सफलता के पीछे का बड़ा कारण यह है कि करसनभाई लगातार अपने उत्पादों के हर ऑपरेश में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। वह कहते है कि प्रोडक्ट को तैयार करने से लेकर, ग्राहकों के फीडबैक लेने तक का खुद करते थे और ग्राहकी पसंद और संतुष्टी के हिसाब से प्रोडक्ट तो तैयार करने का आश्वासन देते थे। करसनभाई पटेल ने अपने साबुन का नाम अपनी बेटी निरुपमा के नाम पर रखा था। जीवन की त्रासदी ने एक सड़क हादसे में उनकी जवान बेटी और परिवार के कुछ सदस्यों को हमेशा के लिए छीन लिया। करसनभाई पटेल ने कारोबार का दायरा सीमेंट, पाउडर, दवाइयों और शिक्षा तक बढ़ा दिया। वह निरमा इंजीनियरिंग कॉलेज और विश्वविद्यालय भी चलाते हैं।

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