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अर्थव्यवस्था के लिए अगले दो महीने हैं संकटपूर्ण, जानिए क्यों?

सरकार ने भले ही बैंकिंग व्यवस्था मजबूत करने और पांच ट्रिलियन वाली इकनॉमी तक पहुंचने के मकसद से 10 बैंकों के विलय का ऐलान किया हो, पर अर्थशास्त्रियों को लगता है इससे अर्थव्यवस्था की हालत सुधारने में कोई अहम भूमिका नहीं होगी।

तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः Freepik)तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः Freepik)

आर्थिक मंदी (Economic Slowdown) की आहटों और पांच फीसदी पर ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (जीडीपी) रेट पहुंचने के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आगामी दो महीने बेहद संकटपूर्ण हैं। यह अंदेशा 30 अगस्त 2019 को जारी किए GDP डेटा के आधार पर लगाया गया है। भारतीय स्टेट बैंक (State Bank of India) के चेयरमैन रजनीश कुमार ने इस बारे में कहा है कि इकनॉमी में संभावित सुधार के लिहाज से आने वाले दो माह कई व्यापारों और कारोबारियों के लिए मुश्किल भरे हो सकते हैं।

बता दें कि इकनॉमी से जुड़े हालिया आंकड़ों के बाद देश की अर्थव्यवस्था पिछले छह साल में सबसे निचले स्तर पर इस तिमाही में आ गई थी। अप्रैल-जून तिमाही में विकास दर पांच पहुंचने के बाद भी SBI चेयरमैन को आस है कि त्यौहारों के मौसम में एक बार फिर से उपभोक्ताओं की मांग में बढ़ोतरी होगी। अन्य अर्थशास्त्रियों की तरह वह भी कड़े नीतिगत सुधारों के पक्ष में हैं, ताकि इस स्लोडाउन का सही से सामना किया जा सके।

एक्सपर्ट्स की मानें तो आगामी दो माह सरकार के लिए कई मायनों में कठिन हो सकते हैं, क्योंकि उसे अर्थव्यवस्था को दोबारा ट्रैक पर लाना है। आमतौर पर फेस्टिव सीजन में कंज्यूमर डिमांड बढ़ जाती है, इसलिए सरकार अगले अब त्यौहारों के मौसम में बिक्री पर पैनी नजर रखेगी। अर्थशास्त्रियों को लगता है कि केंद्र सिर्फ आपूर्ति से जुड़े कदमों पर काम कर रही है, जबकि मांग वाले हिस्से को नजरअंदाज किया जा रहा है। ऐसे में यह चिंता का विषय है, क्योंकि बगैर अच्छी डिमांड के सप्लाई में होने वाले इजाफा अच्छा नहीं माना जाता है।

Yes Bank में चीफ इकनॉमिस्ट शुभदा राव ने एक बिजनेस न्यूज साइट से कहा- सप्लाई की तरफ होने वाली सकारात्मक चीजें के साथ यह भी जरूरी है कि लोगों के पास पैसे भी हों। हालांकि, रिकॉर्ड (ऊपर से) बेरोजगारी दर के साथ विभिन्न क्षेत्रों में लोगों की नौकरियां जाने से देश में ‘डिमांड एंड सप्लाई’ के अनुपात को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिसे इकनॉमिक स्लोडाउन का अहम कारण भी कहा जा रहा है।

वहीं, India Ratings and Research में अर्थशास्त्रियों ने बताया कि मांग में तेजी लाने के लिए छोटे और लंबे समयकाल वाले कदम उठाए जाने की जरूरी है। इनमें लघु-अवधि वाले कदम खासकर त्यौहार के दौरान मांग में बढ़ोतरी लाने में सहायक साबित हो सकते हैं। इतना ही नहीं, सरकार ने भले ही बैंकिंग व्यवस्था मजबूत करने और पांच ट्रिलियन वाली इकनॉमी तक पहुंचने के मकसद से 10 बैंकों के विलय का ऐलान किया हो, पर अर्थशास्त्रियों को लगता है इससे अर्थव्यवस्था की हालत सुधारने में कोई अहम भूमिका नहीं होगी।

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