नया इनकम-टैक्स एक्ट, 2025 1 अप्रैल 2026 से लागू होने जा रहा है। यह दशकों पुराने इनकम-टैक्स एक्ट, 1961 की जगह लेने जा रहा है। इस नए कानून के साथ कई ऐसे नियम भी आए हैं जो चुपचाप आपके निवेश पर टैक्स लगने के तरीके को बदल सकते हैं।

इन्हीं में से एक अहम प्रावधान है, जो कई टैक्सपेयर्स को चौंका सकता है और वह यह है कि टैक्स-फ्री इनकम भी अब आपके इफेक्टिव टैक्स आउटगो को बढ़ा सकती है।

इस बदलाव के केंद्र में इनकम-टैक्स रूल्स, 2026 के तहत नोटिफाई किया गया नया रूल 14 है। यह नियम बताता है कि एग्जेम्प्ट (टैक्स-फ्री) इनकम से जुड़े खर्चों को कैसे ट्रीट किया जाएगा। और यहां मेन नंबर 1% है।

आखिर क्या बदला है?

20 मार्च, 2026 को जारी नोटिफिकेशन के अनुसार, रूल 14 में कहा गया है कि इनकम से जुड़ा कोई भी खर्च जो टोटल इनकम का हिस्सा नहीं है, उसे मना कर दिया जाएगा। इसमें दो हिस्से (एग्जेम्प्ट इनकम से जुड़े सीधे खर्च, एग्जेम्प्ट इनकम पैदा करने वाले (या पैदा करने में सक्षम) निवेश की औसत वैल्यू का 1%) शामिल हैं। जरूरी बात यह है कि कुल डिसअलाउंस टैक्सपेयर द्वारा क्लेम किए गए असल खर्च से ज्यादा नहीं हो सकता।

अगर हम इसे आसान भाषा में समझे तो इसका मतलब है कि भले ही आपकी इनकम, मान लीजिए डिविडेंड या कुछ इन्वेस्टमेंट, टैक्स-फ्री हो, फिर भी टैक्स डिपार्टमेंट उसमें एक काल्पनिक लागत जोड़ सकता है और उस हिस्से को आपके डिडक्शन से डिसअलाउंस कर सकता है।

‘टैक्स-फ्री’ का मतलब हमेशा जीरो टैक्स इम्पैक्ट क्यों नहीं होता?

यहीं पर नियम सोच बदलता है।

जनसत्ता के सहयोगी फाइनेंशियल एक्सप्रेस के अनुसार, NPV & Associates LLP की पार्टनर, CA हिता देसाई, इस बारीक बात को साफ तौर पर समझाती हैं, “1% फ़ॉर्मूला एक स्टैंडअलोन टैक्स नहीं बनाता है, बल्कि सिर्फ वहीं डिसअलाउंस को स्टैंडर्ड बनाता है जहां खर्च मौजूद है या जिसका अंदाजा है।”

तो, आपसे एग्जेम्प्ट आय पर सीधे टैक्स नहीं लिया जा रहा है। लेकिन अगर आप उस इनकम को कमाने के लिए खर्च करते हैं, या ऐसा माना जाता है कि आप खर्च करेंगे, तो उन खर्चों को डिडक्शन के तौर पर अलाउ नहीं किया जाएगा।

नतीजा? आपकी टैक्सेबल इनकम इनडायरेक्टली बढ़ती है और आपकी टैक्स लायबिलिटी भी।

देसाई के अनुसार, एग्जेम्प्ट इनकम पर उन मामलों में इनडायरेक्ट टैक्स कॉस्ट लग सकती है जहां एडमिनिस्ट्रेटिव या फाइनेंशियल खर्चे होते हैं, जिससे पोस्ट-टैक्स रिटर्न पर असर पड़ता है।

यह नियम असल में कब लागू होता है?

नियमों में एक जरूरी क्लैरिफिकेशन यह है कि यह ऑटोमैटिक डिसअलाउंस नहीं है।

जैसा कि नोटिफिकेशन में साफ है, यह नियम तभी लागू होता है जब एग्जेम्प्ट इनकम के संबंध में खर्च का क्लेम किया जाता है या माना जाता है कि वह किया गया है।

यानी अगर सच में आपका कोई खर्च एग्जेम्प्ट इनकम से जुड़ा नहीं है, तो आइडियली कोई डिसअलाउंस नहीं होना चाहिए। हालांकि, असेसिंग ऑफिसर अभी भी आपके क्लेम पर सवाल उठा सकता है और सैटिस्फाइड न होने पर तय तरीका अप्लाई कर सकता है।

किसे सावधान रहना चाहिए?

यह नियम खासकर उन निवेशकों के लिए रेलिवेंट है जो डिविडेंड या टैक्स-फ्री रिटर्न कमा रहे हैं, जिनके पास एग्ज़ेम्प्ट निवेश का बड़ा पोर्टफोलियो है और जो टैक्सपेयर्स एडमिनिस्ट्रेटिव या फाइनेंशियल खर्चे क्लेम कर रहे हैं।

भले ही इनकम खुद एग्ज़ेम्प्ट हो, उससे जुड़े खर्च आपके डिडक्शन को कम कर सकते हैं।

टैक्सपेयर्स को अब क्या करना चाहिए?

नया फ्रेमवर्क डॉक्यूमेंटेशन और प्लानिंग पर साफ फ़ोकस करता है। देसाई सलाह देती हैं: “टैक्सपेयर्स को यह साबित करने के लिए मजबूत डॉक्यूमेंटेशन बनाए रखने पर फोकस करना चाहिए कि जहां भी लागू हो, कोई खर्च नहीं हुआ है।”

[डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए है और यह प्रोफेशनल टैक्स सलाह नहीं है। टैक्स कानून और सिस्टम सरकार द्वारा बार-बार बदले जाते हैं। पढ़ने वालों को कोई भी फाइनेंशियल फैसला लेने से पहले इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के ऑफिशियल नोटिफिकेशन से डिटेल्स वेरिफाई कर लेनी चाहिए या किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट से सलाह लेनी चाहिए।]

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