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भूमि बिल संसदीय समिति की सिफारिशें लागू करने पर मोदी सरकार रजामंद

सरकार ने भूमि विधेयक पर संसदीय समिति की सिफारिशें स्वीकार करने पर रजामंदी जताई है। लेकिन कहा है कि यह उसके अपने रुख से पीछे हटना नहीं है...

खेत में किसान (फाइल फोटो)

सरकार ने भूमि विधेयक पर संसदीय समिति की सिफारिशें स्वीकार करने पर रजामंदी जताई है। लेकिन कहा है कि यह उसके अपने रुख से पीछे हटना नहीं है। वह तो हमेशा ही उन बदलावों के लिए तैयार रही है जिन पर सर्वसम्मति है। पैनल ने यूपीए काल के कानून के प्रावधानों को बरकरार रखा है। ऐसा समझा जा रहा है कि सरकार ने बिहार के आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर अपनी रणनीति बदली है ताकि सत्तारूढ़ दल की किसान-विरोधी छवि न बने जैसा कि विपक्ष भाजपा पर आरोप लगाता रहा है।

ग्रामीण विकास मंत्री बिरेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार का शुरू से ही रुख रहा है कि उसे किसी भी संगठन, राजनीतिक नेता, राजनीतिक दल या किसानों के अच्छे सुझावों को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने यहां प्रेस कांफ्रेंस में कहा- हमें भी उन मुद्दों पर विचार करना चाहिए जिन पर सर्वसम्मति है क्योंकि संयुक्त संसदीय समिति भी आखिरकार एक लघुसंसद ही तो है। यदि कोई विरोध के स्वर होंगे तो हम परीक्षण करेंगे कि कौन से सुझाव हैं।

उन्होंने यहां अपने मंत्रालय के दो संकलन ‘पंचायत दर्पण’ और ‘समन्वय’ जारी करते हुए कहा कि हमारा रुख क्या होगा यह सात अगस्त के बाद ही पता चलेगा। यह इस पर निर्भर करता है कि संयुक्त संसदीय समिति क्या रिपोर्ट देती है और क्या संयुक्त समिति की रिपोर्ट में सर्वसम्मति है या उसमें विरोध के नोट हैं।

सिंह का बयान ऐसे समय में आया है जब भाजपा सांसद एसएस अहलुवालिया की अगुवाई वाली संयुक्त संसदीय समिति ने मोदी सरकार के विधेयक में बदलावों को मंजूरी दे दी है जिनमें सहमति का उपबंध भी है और इससे यूपीए काल का कानून बरकरार रहेगा। सरकार के अपने रुख से संभावित रूप से पीछे हटने का रास्ता सभी 11 भाजपा सदस्यों ने संयुक्त संसदीय समिति में संशोधन पेश कर तैयार किया।

इन सदस्यों ने पिछले साल दिसंबर में मोदी सरकार की ओर से किए गए बदलावों को हटाते हुए सहमति उपबंध और सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन समेत यूपीए काल के भूमि कानून के अहम प्रावधानों को वापस लाने की सिफारिश की। मोदी सरकार दिसंबर में भूमि कानून में बदलाव करने के बाद उसे तीन बार अध्यादेश के रूप में लाई थी।

जब सिंह से पूछा गया कि क्या सरकार के लिए यह पीछे हटना नहीं है जो यूपीए के कानून में बदालव के पक्ष में तीन बार अध्यादेश लाकर भूमि विधेयक पर बहुत आगे चली गई, तो केंद्रीय मंत्री ने कहा- अपने रुख से पीछे हटने जैसा कुछ नहीं है। यह आप लोग हैं जो कह रहे हैं कि हम पीछे हट रहे हैं। यहां तक कि संविधान जो सभी वर्गों की सहमति से बना था, 100 से अधिक बार संशोधित करना पड़ा। उन्होंने कहा- हम अपनी मांग पर बने हुए हैं। जब हमने यह मामला समिति के पास भेजा था तब भी हमने कहा था कि हमारा मानना है अधिग्रहण की प्रक्रिया तेज करना है। लेकिन हमारा यह स्पष्ट रुख था कि उसके लिए किसानों के हितों की उपेक्षा न हो।

यूपीए शासन के 2013 के कानूनों को बरकरार रखने की पक्षधर कांग्रेस के अलावा वामदल, सपा, जद (एकी), बसपा और बीजद भी भूमि कानून में किए गए बदलावों का जोरदार विरोध कर रही थीं। सत्तारूढ़ राजग के सहयोगी शिवसेना, शिरोमणि अकाली दल और स्वभिमानी पक्ष भी विधेयक के कई प्रावधानों से असहमत थे और सहमति व सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन को बनाए रखने पर जोर दे रहे थे। स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ, अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम समेत कई भगवा आनुषांगिक सगठन भी इन दोनों उपबंधों को बनाए रखने की मांग कर रहे थे।

संयुक्त संसदीय समिति के सामने जो 672 प्रतिवेदन आए उनमें 670 में सरकार के भूमि कानून में किए गए बदलावों, खासकर सहमति उपबंध और सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन के सिलसिले में किए गए परिवर्तन का विरोध किया गया। हालांकि ग्रामीण विकास मंत्री ने कहा- यह विरोध नहीं है बल्कि उनके सुझाव सहयोगियों की ओर से व्यक्त विचार या भाजपा सांसदों के दिए गए संशोधन हैं। यह सच है जो भी नए सुझाव आए हैं, उन पर विचार किया जाना है।

जब ग्रामीण विकास मंत्री से सहमति उपबंध और सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन, जिन्हें हटाने का राजग सहयोगियों समेत ज्यादातर पक्षकारों व राजनीतिक दलों ने विरोध किया था, पर उनकी निजी राय के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘‘मेरी राय, जब आप मेरे पास अकेले आएंगे तब मैं बताऊंगा, न कि प्रेस कांफ्रेंस में। उन्होंने कहा- समिति को तीन और उपबंधों पर विचार करना है। उनकी रिपोर्ट का इंतजार कर लिया जाए।

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