टाटा ट्रस्ट्स द्वारा टाटा संस के प्रस्तावित पुनर्गठन ने ट्रस्ट्स के अंदर एक नई दरार पैदा कर दी है, जिसमें दो सीनियर ट्रस्टी सवाल उठा रहे हैं कि टाटा संस के रीऑर्गेनाइजेशन का फैसला ट्रस्ट के सभी सदस्यों से सलाह किए बिना क्यों लिया गया।
सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (एसडीटीटी) के ट्रस्टियों को लिखे एक लेटर में एसडीटीटी के वाइस-चेयरमैन और ट्रस्टी वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने टाटा ट्रस्ट्स के 28 सितंबर के उस कम्युनिकेशन पर आपत्ति जताई है, जिसमें टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स के टाटा संस के साथ मर्जर से जुड़े एक स्ट्रेटेजिक रीऑर्गेनाइजेशन के लिए टाटा संस बोर्ड की मंजूरी मांगी गई थी।
श्रीनिवासन और सिंह ने कहा कि प्रस्तावित रीऑर्गेनाइजेशन के टाटा संस, एसडीटीटी और दूसरे स्टेकहोल्डर्स के लिए गंभीर फाइनेंशियल नतीजे भी हो सकते हैं। उन्होंने लिखा, “इनमें ग्रुप कंपनियां, कर्मचारी और रेगुलेटर शामिल हैं जो एमैलगमेशन और टाटा संस के रेगुलेटरी स्टेटस में बदलाव से प्रभावित हैं।”
श्रीनिवासन और विजय सिंह दोनों ने इस सप्ताह की शुरुआत में एसडीटीटी के खिलाफ अलग-अलग नियमों के “उल्लंघन” के लिए रेगुलेटरी कार्रवाई के लिए चैरिटी कमिश्नर को लिखा था।
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दोनों ट्रस्टियों ने कहा कि वे “पब्लिक सोर्स” से इस प्रस्ताव और साथ में की गई पब्लिक घोषणा के बारे में जानकर हैरान थे, उन्होंने आरोप लगाया कि एसडीटीटी की कोई मीटिंग नहीं हुई और ट्रस्ट के नाम पर कम्युनिकेशन जारी करने से पहले उनसे सलाह नहीं ली गई।
उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया है कि प्रस्ताव किस तरह से टाटा संस के बोर्ड को रीस्ट्रक्चरिंग पर “विचार करने और मंजूरी देने” का निर्देश देने की कोशिश करता है, उनका तर्क है कि इतने कानूनी, रेगुलेटरी, फाइनेंशियल और कमर्शियल महत्व के फैसले का कंपनी के बोर्ड द्वारा स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
टाटा ग्रुप पर नजर रखने वाले एक ऑब्जर्वर ने कहा, “17 सितंबर की मीटिंग के लहजे और दो ट्रस्टियों के नए लेटर को देखते हुए, टाटा संस के डायरेक्टर इसका विरोध कर सकते हैं। अगर बोर्ड सहमत भी हो जाता है, तो भी आरबीआई को मनाना होगा।”
वेणु श्रीनिवासन भी टाटा संस के बोर्ड में हैं। श्रीनिवासन और सिंह ने लेटर में कहा, “हमारी जानकारी के मुताबिक, टाटा संस को लेटर भेजने से पहले इस मुद्दे पर चर्चा या विचार-विमर्श के लिए एसडीटीटी के ट्रस्टियों की कोई मीटिंग नहीं हुई थी। हमसे सलाह नहीं ली गई, और हमें यह भी नहीं पता कि दूसरे ट्रस्टियों से भी सलाह ली गई थी। इसलिए यह साफ नहीं है कि लेटर और उसमें दिए गए प्रस्ताव को एसडीटीटी के सभी ट्रस्टियों का समर्थन है या नहीं।”
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उन्होंने लिखा, “हम इस बात से भी उतने ही चिंतित हैं कि टाटा ट्रस्ट्स के नाम पर एसडीटीटी के ट्रस्टियों से उनके कंटेंट या ऑथराइजेशन पर सलाह लिए बिना प्रेस रिलीज जारी की जा रही हैं।”
उन्होंने कहा कि प्रस्तावित रीऑर्गेनाइजेशन एक अहम फैसला है, जिसमें दो ऑपरेटिंग कंपनियों का मर्जर आरबीआई की मंजूरी और टाटा संस के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट का सरेंडर शामिल है, जिसका टाटा ट्रस्ट्स के हितों और टाटा संस के बिजनेस मामलों पर काफी असर पड़ेगा।
लेटर में कहा गया, “इसलिए इसके लीगल, फाइनेंशियल, कमर्शियल, गवर्नेंस और इंस्टीट्यूशनल नतीजों पर विचार करना जरूरी है और इतने बड़े मामले पर ट्रस्ट की तरफ से कोई भी राय देने से पहले, जरूरी मटीरियल और एनालिसिस ट्रस्टीज को उपलब्ध कराया जाना चाहिए था।”
रीऑर्गेनाइजेशन का बताया गया उद्देश्य यह है कि बनने वाली एंटिटी (टाटा संस) न तो एनबीएफसी होगी और न ही कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी। उन्होंने लिखा, “लेटर के उसी दिन, ‘टाटा ट्रस्ट्स’ के नाम से रीऑर्गेनाइजेशन की घोषणा करते हुए एक प्रेस रिलीज जारी की गई थी। हमें लेटर की एक कॉपी मिलने और पब्लिक सोर्स से प्रेस रिलीज के बारे में पता चलने पर हैरानी हुई।”
उन्होंने लिखा, “हम भी इस बात से उतने ही परेशान हैं कि ‘टाटा ट्रस्ट्स’ के नाम पर प्रेस रिलीज एसडीटीटी के ट्रस्टीज़ से उनके कंटेंट या ऑथराइज़ेशन पर सलाह लिए बिना जारी की जा रही हैं। चूंकि एसडीटीटी के ट्रस्टीज की किसी भी मीटिंग ने लेटर या प्रेस रिलीज को ऑथराइज़ नहीं किया, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि दोनों में से कोई भी एसडीटीटी की कलेक्टिव, इंस्टीट्यूशनल राय को दिखाता है।”
उन्होंने कहा कि यह सवाल उठता है कि क्या किसी शेयरहोल्डर के लिए कंपनी के बोर्ड को किसी ऐसे मामले को “मंजूरी” देने का निर्देश देना सही है, जिसे कानून बोर्ड के अपने स्वतंत्र फैसले पर छोड़ता है, बजाय इसके कि बोर्ड के विचार के लिए कार्रवाई का रास्ता सुझाया जाए।
उन्होंने कहा, “ट्रस्टीज को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि इस तरह के कम्युनिकेशन के तरीके का ट्रस्ट्स के चैरिटेबल स्टेटस पर क्या असर पड़ सकता है, अगर इसे एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा शेयरहोल्डर के तौर पर अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने के बजाय कंपनी के कमर्शियल फैसले लेने को डायरेक्ट करने की कोशिश के तौर पर समझा जाए।”
पत्र में कहा गया है कि इन मामलों पर सही तरीके से विश्लेषण और विचार-विमर्श की जरूरत है, जिसमें टाटा संस के हितों का ध्यान रखना भी शामिल है। एसडीटीटी की संस्थागत स्थिति को किसी भी व्यक्तिगत ट्रस्टी की राय से अलग देखा जाना चाहिए और सभी ट्रस्टियों को ज़रूरी जानकारी पर विचार करने और फैसला लेने की प्रक्रिया में शामिल होने का मौका मिलना चाहिए। खासकर तब, जब कोई बात ट्रस्ट के नाम पर कही जा रही हो और उसमें ट्रस्ट की साख और प्रतिष्ठा जुड़ी हो।
28 सितंबर को टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा संस बोर्ड को एक प्रस्ताव भेजा, जिसमें टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड (टीईएसएस) और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (टीसीई) का टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड (टीएसपीएल) में विलय करने की बात कही गई थी। अगर इस कदम को मंज़ूरी मिल जाती है और इसे लागू किया जाता है, तो टाटा संस का ढांचा और स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा और यह उस रेगुलेटरी दायरे से बाहर हो सकता है जिसके कारण RBI ने लिस्टिंग का निर्देश दिया था।
आसान शब्दों में कहें तो रणनीति यह है कि टाटा संस को एक इन्वेस्टमेंट कंपनी के बजाय एक ऑपरेटिंग कंपनी बनाया जाए। इस विलय से यह काम दो तरह से हो सकता है। पहला, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सीधे टाटा संस में एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग और सेमीकंडक्टर बिजनेस लाएगी। दूसरा, टीसीई एक स्थापित इंजीनियरिंग और कंसल्टेंसी ऑपरेशन जोड़ेगी, जिसकी अपनी अच्छी-खासी कमाई है।
ग्रुप में चल रही सत्ता की खींचतान को देखते हुए, सबसे बड़ा सवाल यह है: क्या टाटा संस का बोर्ड टाटा ट्रस्ट्स के प्रस्ताव को मानेगा? बोर्ड ने 17 सितंबर को हुई बैठक में 4:1 के बहुमत से RBI के निर्देशानुसार लिस्टिंग की दिशा में कदम उठाने पर सहमति जताई। चार डायरेक्टरों ने लिस्टिंग प्रक्रिया को मंज़ूरी दी। सिर्फ़ नोएल टाटा ने इस योजना का विरोध किया।
टाटा ट्रस्ट्स से जुड़ी SRTT, चैरिटी कमिश्नर के रोक लगाने वाले आदेश के कारण बैठकें करने और फैसले लेने में असमर्थ है। एसआरटीटी और एसडीटीटी का टाटा संस में 50% से ज्यादा हिस्सेदारी पर नियंत्रण है।
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टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम्स और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (टीसीई) का टाटा संस के साथ प्रस्तावित मर्जर टाटा संस की मौजूदा स्थिति को पूरी तरह बदल सकता है। इससे टाटा संस की कुल संपत्ति और आय में वित्तीय और निवेश गतिविधियों का हिस्सा कम हो जाएगा।
टाटा ट्रस्ट्स का तर्क है कि इस प्रस्ताव से टाटा संस, आरबीआई की एसबीएफसी या कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (सीआईसी) की रेगुलेटरी परिभाषा से बाहर आ जाएगा और स्टॉक एक्सचेंजों में लिस्टिंग से बच जाएगा। यहां पढ़ें पूरी खबर…
