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हेलिकॉप्‍टर कंपनी पवन हंस को बेचने की एक और कोशिश करेगी मोदी सरकार, 2 बार मिली है नाकामी

हेलिकॉप्‍टर सर्विस प्रोवाइड कराने वाली कंपनी पवन हंस को बेचने की प्रक्रिया सरकार के लिए चुनौती बन गई है।

पवन हंस में सरकार की 51 फीसदी है हिस्सेदारी

केंद्र सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की हेलिकॉप्‍टर कंपनी पवन हंस में हिस्सेदारी बेचने की एक और कोशिश करेगी। इसके लिए सरकार ने एक बार फिर से बोलियां आमंत्रित की है।

आपको बता दें कि इससे पहले, दो बार इसकी बिक्री का प्रयास असफल रहा है। सरकार की पवन हंस में 51 प्रतिशत और ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) की इसमें 49 प्रतिशत हिस्सेदारी है। पूर्व में ओएनजीसी ने सरकार की हिस्सेदारी बेचे जाने के साथ कंपनी में अपनी भी पूरी हिस्सेदारी बेचने की पेशकश करने का निर्णय किया था, लेकिन बाद में वापस ले लिया।

कर्मचारियों का क्या होगा: सरकार की ओर से जारी बयान के मुताबिक सफल बोलीदाता यह सुनिश्चित करेंगे कि कंपनी किसी भी स्थायी कर्मचारी को प्रस्तावित सौदे की तारीख से एक साल तक के लिये नौकरी से नहीं निकाले। अगर इस अवधि में कर्मचारियों को निकाला जाता है, यह सुनिश्चित हो कि कंपनी अपने कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की पेशकश करे। 31 जुलाई, 2020 की स्थिति के अनुसार कंपनी के कर्मचारियों की संख्या 668 थी। इसमें 363 कर्मचारी स्थायी और 323 कर्मचारी अनुबंध पर थे। वित्त वर्ष 2019-20 में कंपनी को 28 करोड़ रुपये और 2018-19 में 69 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ था।

दो बार बेचने का हुआ प्रयास: सरकार ने दो बार पवन हंस में अपनी हिस्सेदारी बेचने की पेशकश की। 2018 में सरकार ने पवन हंस में 51 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने के लिये बोली आमंत्रित की थी। इसके बाद 2019 में पवन हंस के विनिवेश के लिये दूसरा प्रयास किया गया, लेकिन निवेशकों ने इसमें रूचि नहीं दिखायी।

1985 से शुरुआत: पवन हंस का गठन अक्टूबर 1985 में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के रूप में हुआ। मुख्य रूप से इसका कार्य ओएनजीसी को उत्खनन कार्यों के लिये हेलीकॉप्टर सेवा उपलब्ध कराना है। कंपनी की अधिकृत पूंजी 31 मार्च, 2020 की स्थिति के अनुसार 560 करोड़ रुपये और चुकता शेयर पूंजी 557 करोड़ रुपये थी। (भाषा से इनपुट)

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