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मनरेगा मजदूरों को अपनी ही दिहाड़ी निकालने को लगाने पड़ते हैं बैंकों के चक्कर, सर्वे में हुए ये खुलासे

सर्वे के मुताबिक एक मजदूर का पोस्ट ऑफिस जाने का एक बार का खर्च 6 रुपये तक आता है। इसके अलावा बैंक विजिट पर 31 रुपये और एटीएम तक जाने और कैश निकालने के लिए उन्हें 67 रुपये खर्च करने पड़ते हैं।

मनरेगा मजदूरों को अपनी ही दिहाड़ी निकालने के लिए लगाने पड़ रहे चक्कर

मनरेगा के तहत महज 202 रुपये की दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूरों को अपनी इस रकम को निकालने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। LibTech India की ओर से किए गए एक सर्वे के मुताबिक 45 फीसदी मनरेगा मजदूर ऐसे हैं, जिन्हें अपनी दिहाड़ी की रकम निकालने के लिए बैंकों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। इनमें से 40 फीसदी मजदूर ऐसे हैं, जिन्हें बायोमीट्रिक डिटेल्स मैच न करने के चलते कई बार बैंक या फिर डाकघर से खाली हाथ वापस लौटना पड़ा है।

ऐसा उनकी साथ 5 ट्रांजेक्शंस में से कम से कम एक बार हुआ है। यही नहीं इसके चक्कर में बेहद मामूली कमाई कर पाने वाले मजदूरों को अपनी जेब से पैसे भी गंवाने पड़ते हैं। सर्वे के मुताबिक एक मजदूर का पोस्ट ऑफिस जाने का एक बार का खर्च 6 रुपये तक आता है। इसके अलावा बैंक विजिट पर 31 रुपये और एटीएम तक जाने और कैश निकालने के लिए उन्हें 67 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। LibTech India की ओर से आंध्र प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में 1,947 लोगों पर किए गए सर्वे में यह बात सामने आई है।

केंद्र सरकार की ओर से मनरेगा मजदूरों की दिहाड़ी के तत्काल भुगतान की तमाम कोशिशों के बाद भी यह स्थिति पैदा होना चिंताजनक है। बता दें कि कोरोना काल में शहरों से वापस लौटे मजदूरों ने बड़ी संख्या में गांवों में अपनी आजीविका के लिए मनरेगा के तहत पंजीकरण कराया था।

कोरोना काल में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मनरेगा स्कीम ने किस तरह से बचाया है, इसका उदाहरण है कि इस वित्त वर्ष के शुरुआती 4 महीनों में हरियाणा, यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और गुजरात जैसे राज्यों में काम मांगने वालों की संख्या में 50 फीसदी से ज्यादा तक का इजाफा हुआ है।

यही नहीं इसके चलते केंद्र सरकार ने मनरेगा स्कीम के सालाना बजट में भी इजाफा करते हुए 40,000 करो़ड़ रुपये अतिरिक्त जारी किए हैं। इससे पहले इस स्कीम के तहत 61,500 करोड़ रुपये की रकम सरकार की ओर से जारी किए गए थे।

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