देश की दो महारत्न कंपनियों पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन (PFC) और REC लिमिटेड के प्रस्तावित विलय की प्रक्रिया में बड़ा कदम उठ गया है। REC के PFC में मर्जर प्रस्ताव को भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की मंजूरी मिल गई है, जिससे दोनों सरकारी वित्तीय कंपनियों के एकीकरण का रास्ता और साफ हो गया है।
राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ इस बहुप्रतीक्षित विलय की दिशा में एक महत्वपूर्ण औपचारिकता पूरी हो गई है। हालांकि, मर्जर को अंतिम रूप देने से पहले अभी अन्य नियामकीय मंजूरियां और जरूरी प्रक्रियाएं पूरी की जानी बाकी हैं।
इस संबंध में जारी एक्सचेंज फाइलिंग में PFC ने कहा, ‘यह हमारे 16 मई, 2026 के उस पत्र के सिलसिले में है, जिसमें कंपनी ने REC लिमिटेड के PFC में विलय के प्रस्ताव को भारत के माननीय राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए सुरक्षित रखने के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के फैसले की जानकारी दी थी।
इस संबंध में, यह सूचित किया जाता है कि विद्युत मंत्रालय ने 10 जून, 2026 के अपने पत्र के ज़रिए, उक्त प्रस्ताव के संबंध में भारत के माननीय राष्ट्रपति की मंजूरी की जानकारी दी है।’
16 मई को बोर्ड ने क्या फैसला लिया था?
16 मई 2026 को हुई बैठक में PFC के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने REC लिमिटेड के PFC में प्रस्तावित विलय के प्रस्ताव को भारत के राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए सुरक्षित रखने (reserve) का फैसला किया था। बोर्ड ने कंपनी के CMD को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए आवेदन करने और आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने का भी अधिकार दिया था।
कंपनी ने कहा था कि विलय की प्रक्रिया कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 230-232 के तहत पूरी की जाएगी। प्रस्तावित मर्जर के लिए शेयर एक्सचेंज रेशियो स्वतंत्र मूल्यांकनकर्ताओं (Valuers) द्वारा तय किया जाएगा। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि विलय के बाद बनने वाली इकाई का ‘सरकारी कंपनी’ (Government Company) का दर्जा बरकरार रहे।
फाइलिंग के अनुसार, मर्जर प्रभावी होने के बाद REC की सभी संपत्तियां, अधिकार, अनुबंध और देनदारियां PFC को हस्तांतरित हो जाएंगी तथा REC का अलग कानूनी अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। हालांकि, यह प्रक्रिया अंतिम बोर्ड मंजूरी, नियामकीय स्वीकृतियों और अन्य आवश्यक अनुमतियों के अधीन रहेगी।
पीएफसी ने सात साल पहले खरीदी थी हिस्सेदारी
गौरतलब है कि मार्च 2019 में PFC ने केंद्र सरकार से REC में 52.63% हिस्सेदारी खरीदी थी। इस अधिग्रहण के बाद REC, PFC की सहायक कंपनी बन गई थी। तब से दोनों सरकारी वित्तीय कंपनियों के संभावित एकीकरण को लेकर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं।
PFC के बारे में
पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन (PFC) की स्थापना 16 जुलाई 1986 को हुई थी। यह भारत सरकार के ऊर्जा मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत काम करने वाली एक महारत्न केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी (Maharatna CPSE) है। PFC देश की प्रमुख गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) है, जो बिजली क्षेत्र की परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करती है। कंपनी का मुख्यालय नई दिल्ली में है, जबकि इसके क्षेत्रीय कार्यालय मुंबई और चेन्नई में स्थित हैं।
PFC बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण से जुड़ी परियोजनाओं को वित्तपोषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कंपनी को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी (IFC) का दर्जा दिया है और अक्टूबर 2021 में इसे महारत्न का दर्जा मिला था।
REC के बारे में
REC लिमिटेड की स्थापना 1969 में हुई थी और यह ऊर्जा मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत काम करने वाली महारत्न सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी है। कंपनी RBI के साथ NBFC, पब्लिक फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन (PFI) और इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग कंपनी (IFC) के रूप में पंजीकृत है। शुरुआत में REC का उद्देश्य कृषि सिंचाई के लिए पंपसेटों के विद्युतीकरण को बढ़ावा देना था, लेकिन समय के साथ इसका दायरा पूरे पावर इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर तक फैल गया।
आज REC बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन, वितरण, नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी स्टोरेज और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
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दुनिया के सबसे बड़े शेयर बाजारों की रैंकिंग में हाल ही में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। दक्षिण कोरिया ने भारत को पीछे छोड़ते हुए दुनिया के छठे सबसे बड़े शेयर बाजार का स्थान हासिल कर लिया है। कुछ समय पहले तक भारत इस स्थान पर था, लेकिन अब वह एक पायदान नीचे खिसक गया है।
यह बदलाव सिर्फ रैंकिंग का मामला नहीं है, बल्कि इससे यह भी पता चलता है कि अलग-अलग देशों के शेयर बाजारों का प्रदर्शन कैसा रहा है और निवेशकों का रुझान किस ओर है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दुनिया के सबसे बड़े शेयर बाजारों की रैंकिंग किस आधार पर तय होती है और दक्षिण कोरिया भारत से आगे कैसे निकल गया। आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं…
