25-45 साल के पुरुषों में सुंदर दिखने की जबरदस्त चाहत, ब्यूटी प्रोडक्ट्स खरीदने में महिलाओं को पीछे छोड़ा

रिपोर्ट के मुताबिक, पुरुष सौंदर्य प्रसाधन उद्योग अगले तीन साल में संचयी रूप से 45 प्रतिशत की दर से बढ़कर 35,000 करोड़ रुपए पहुंच जाने का अनुमान है।

Author नई दिल्ली | Updated: January 23, 2018 7:47 PM
Assocham Report, Assocham Report on Beauty Products, Beauty Products spend, Beauty Products in india, Beauty Products for men, Beauty Products for women, Men Spend, Money on Beauty Products, Heath newsपुरुषों में सुदंर दिखने की आकांक्षा बढ़ी है। (Source: Thinkstock Images)

यह माना जाता है कि महिलाएं साज-श्रृंगार के मामले में पुरुषों से आगे हैं लेकिन एक रिपोर्ट के अनुसार सुंदर दिखने की आकांक्षा युवाओं में कम नहीं है। उद्योग मंडल एसोचैम की एक रिपोर्ट के अनुसार 25 से 45 वर्ष के पुरुषों ने रूप सज्जा तथा सौंदर्य प्रसाधन पर खर्च के मामले में महिलाओं को पीछे छोड़ दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, पुरुष सौंदर्य प्रसाधन उद्योग अगले तीन साल में संचयी रूप से 45 प्रतिशत की दर से बढ़कर 35,000 करोड़ रुपए पहुंच जाने का अनुमान है। इसका कारण पुरुषों में सुदंर दिखने की आकांक्षा तथा तेजी से बढ़ता शहरीकरण है। उद्योग मंडल एसोचैम की एक रिपोर्ट में यह कहा गया है।

पुरुषों के साज-सज्जा से जुड़े उद्योग का आकार फिलहाल भारत में 16,800 करोड़ रुपए है। प्रति व्यक्ति आय तथा शहरीकरण बढ़ने से पिछले पांच साल में बाजार 45 प्रतिशत की दर से बढ़ा है। सर्वे के अनुसार, “यह दिलचस्प है कि 25 से 45 वर्ष के पुरुषों ने रूप सज्जा तथा सौंदर्य प्रसाधन पर खर्च के मामले में महिलाओं को पीछे छोड़ दिया है।” छोटे शहरों में पुरुष बेहतर दिखने की ज्यादा ललक है। यह बात खासकर गोरापन बढ़ाने वाले उत्पादों पर विशेषतौर पर लागू है।

उद्योग मंडल ने एक रिपोर्ट में कहा कि लाइफ स्टाइल में बदलाव, पैसा आने, उत्पादों का बेहतर विकल्प आदि कारणों से भारतीय पुरुषों में सौंदर्य प्रसाधन उत्पादों की मांग बढ़ रही है। पुरुषों के सौंदर्य प्रसाधन में आय के लिहाज से फिलहाल दाढ़ी बनाने के उत्पादों का बाजार सर्वाधिक है। उसके बाद डियोडोरेंट्स का स्थान है।

वहीं दूसरी तरफ, उद्योग मंडल एसोचैम ने आगामी बजट में शिक्षा क्षेत्र के लिए आवंटन बढ़ाने की मांग की है। साथ ही उद्योग मंडल ने उच्च शिक्षा को माल एवं सेवा कर (जीएसटी) से मुक्त करने की भी वकालत की है। वित्त मंत्री अरुण जेटली को लिखे पत्र में चैंबर ने दलील दी है कि बाहरी नियमनों तथा कैंपस में आंदोलन के जोखिमों के मद्देनजर शिक्षा संस्थान न तो नए कर का बोझ खुद उठा सकते हैं और न ही फीस बढ़ाकर छात्र-छात्राओं पर इसका बोझ डाल सकते हैं।

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