MDH: Leves Pakistan after partition, drives tonga in delhi then becomes Masala King, untold story of Mahashay Dharampal Gulati - मौत के खौफ में पाकिस्तान से भागकर आया एक रिफ्यूजी, एक तांगा खरीदा और बाद में बना भारत का मसाला किंग - Jansatta
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मौत के खौफ में पाकिस्तान से भागकर आया एक रिफ्यूजी, एक तांगा खरीदा और बाद में बना भारत का मसाला किंग

एमडीएच मसालों के विज्ञापन में दिखने वाले दादा जी को जानते हैं आप? दादा जी का नाम है महाशय धर्मपाल गुलाटी और एमडीएच मतलब महाशियां दी हट्टी। महाशियां दी हट्टी से एमडीएच बनने तक की एक दिलचस्प कहानी है और यह भी सच है कि अगर देश का बंटवारा नहीं हुआ होता तो मसाले की इस कंपनी पर पाकिस्तान इतराता।

मसाला किंग महाशय धर्मपाल गुलाटी की फाइल फोटो। (Image Source: Facebook/Gaurav Siddharth)

एमडीएच मसालों के विज्ञापन में दिखने वाले दादा जी को जानते हैं आप? दादा जी का नाम है महाशय धर्मपाल गुलाटी और एमडीएच मतलब महाशियां दी हट्टी। महाशियां दी हट्टी से एमडीएच बनने तक की एक दिलचस्प कहानी है और यह भी सच है कि अगर देश का बंटवारा नहीं हुआ होता तो मसाले की इस कंपनी पर पाकिस्तान इतराता। करीब 100 देशों में अपने मसालों से लोगों के मुंह का जायका बनाने वाले धर्मपाल गुलाटी पर विदेशी मीडिया में भी खूब लिखा गया है। उम्र की सेंचुरी के करीब यानी 95 वर्षीय महाशय धर्मपाल गुलाटी के पिता चुन्नी लाल गुलाटी ने सियालकोट के बाजार पंसारियां में (जोकि अब पाकिस्तान में है) 8 मार्च 1919 को महाशियां दी हट्टी के नाम से मसालों की दुकान खोली थी। धर्मपाल गुलाटी ने बहुत ही कम उम्र में काम करना शुरू कर दिया था। उन्होंने 10 वर्ष की उम्र में पांचवी परीक्षा देने से पहले ही स्कूल छोड़ दिया था।

वॉल स्ट्रीट जरनल को दिए गुलाटी के एक पुराने इंटरव्यू के मुताबिक, ”1947 में देश का बंटवारा हुआ, लोग पलायन करने लगे और धार्मिक हिंसा की खबरें फैलने लगीं तो असुरक्षा का डर सताने लगा। हमें पता था कि अब अपना घर छोड़ने का वक्त आ गया है। 7 सितंबर 1947 को परिवार समेत अमृतसर के शरणार्थी शिविर में आया। मैं तब 23 साल का था। काम की तलाश में दिल्ली आया। हमें लगा कि दंगा पीड़ित इलाकों से अमृतसर काफी पास था। दिल्ली पंजाब से सस्ता भी लगा। करोलबाग स्थित भांजे के बिना पानी, बिजली और शौचालय वाले फ्लैट में रहे। दिल्ली आते वक्त पिता ने 1500 रुपये दिए थे, उनमें से 650 रुपये का तांगा खरीदा। कनॉट प्लेस से करोल बाग तक एक बार का 2 आना किराया लेता था।

करोल बाग की पहली दुकान। (Image Source: Facebook/Kumar S)

कम आय के कारण परिवार का भरण-पोषण कठिन हो गया। ऐसे भी दिन आते थे जब सवारी नहीं मिलती थी। पूरे दिन चिल्लाते थे और लोगों का अपमान झेलते थे। तांगा बेचकर परिवार का व्यवसाय अपना लिया। अजमल खान रोड पर मसालों की एक छोटी सी दुकान खोल ली। दिन बहुरे, दुकान चल निकली और दाल-रोटी की समस्या नहीं रही। सियालकोट के मसाले वाले के नाम से मशहूर होने लगे। दिल्ली में एमडीएच साम्राज्य की नींव रखी। 1953 में चांदनी चौक में एक और दुकान किराये पर ली और 1959 में कीर्ति नगर में एक प्लाट खरीदकर अपनी फैक्ट्री शुरू की। जैसे-जैसे कारोबार बढ़ रहा था वैसे-वैसे दिल्ली भी बढ़ रही थी। तांगा वाले दिन और पाकिस्तान का बचपन वाला घर यादा आता है लेकिन दिल्ली अब हमारा घर है।”

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