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दहेज की मांग न हुई पूरी तो सऊदी अरब में रह रहे पति ने मोबाइल पर दे दिया तीन तलाक

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में भारत-नेपाल के सीमावर्ती रूपईडीहा इलाके में दहेज की मांग पूरी नहीं करने पर एक विवाहिता को सऊदी अरब में रह रहे उसके पति ने मोबाइल पर ‘तीन तलाक’ दे दिया।

Author लखनऊ | October 4, 2018 3:53 PM
साउदी अरब में रह रहे पति ने फोन पर पत्नी को दिया तीन तलाक

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में भारत-नेपाल के सीमावर्ती रूपईडीहा इलाके में दहेज की मांग पूरी नहीं करने पर एक विवाहिता को सऊदी अरब में रह रहे उसके पति ने मोबाइल पर ‘तीन तलाक’ दे दिया। पुलिस अधीक्षक सभाराज सिंह ने गुरुवार को बताया कि रूपईडीहा क्षेत्र की रहने वाली नूरी (20) ने इस संबंध में थाने में शिकायत दर्ज करायी है। उसने कहा कि एक साल पहले उसकी शादी रूपईडीहा के ही नई बस्ती के रहने वाले चांदबाबू से हुआ था। शादी के एक सप्ताह बाद से उससे दहेज में मोटरसाइकिल और 50 हजार रुपये की मांग की जाने लगी। नूरी ने बताया कि शादी के कुछ माह बाद उसका शौहर काम के सिलसिले में सऊदी अरब चला गया। उसके बाद उसकी सास और ननद दहेज की मांग को लेकर कर उसे प्रताड़ित करने लगीं।

उसने आरोप लगाया कि बीते 10 सितम्बर को नूरी की सास राबिया, ननद मीना ने फिर से दहेज की मांग की। उसी दिन चांदबाबू ने भी मोबाइल फोन पर वही मांग दोहरायी। नूरी के असमर्थता जताने पर चांदबाबू ने उसे फोन पर ही तीन तलाक दे दिया, जिसके बाद उसे घर से निकाल दिया गया। सह ने बताया कि बुधवार शाम आरोपी पति, सास तथा ननद के खिलाफ मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण अध्यादेश (धारा 314), दहेज अधिनियम (धारा तीन एवं चार) तथा मारपीट और जान से मारने की धमकी देने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है। मामले की जांच की जा रही है।

गौरतलब है कि पिछले माह ही दिल्ली उच्च न्यायालय ने तीन तलाक अध्यादेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दी थी। इस अध्यादेश में तीन बार तलाक बोलकर पत्नी को तलाक देने पर तीन साल की जेल या जुर्माना का प्रावधान है। दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन और न्यायाधीश वी. कामेश्वर राव ने कहा कि तीन तलाक को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है और अब इस मुद्दे पर फैसला करना सरकार के पाले में है।  अदालत वकील शाहिद आजाद द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में कहा गया,”अध्यादेश मनमाना और अनावश्यक है और एक कठोर, अमानवीय, अनुचित और अस्पष्ट कानून को अस्तित्व में लाता है जो अध्यादेश के जरिए संसद के सम्मान और जिन लोगों का विश्वास भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान में निहित है उनके सम्मान में कमी को दर्शाता है।

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