लॉकडाउन का असर: 50 फीसदी ग्रामीणों ने खाने-पीने में भी की कटौती, एक तिहाई लोग बोले- मई तक के लिए ही बचा है राशन

lockdown effect on poors: सर्वे में आधे लोगों ने कहा कि उन्होंने कोरोना के संकट की वजह से कम चीजें खाना शुरू किया है और पहले से कम बार खा रहे हैं। सर्वे में 68 फीसदी परिवार ऐसे थे, जिनका कहना है कि उन्होंने खाने के आइटम्स में कटौती की है।

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एक तिहाई ग्रामीण परिवार बोले हमारे पास बचा है सिर्फ मई तक के लिए राशन

लॉकडाउन के चलते पैदा हुई आर्थिक तंगी की वजह से देश के आधे ग्रामीणों ने अपने खाने तक में कटौती कर दी है। 12 राज्यों के 5,000 ग्रामीण परिवारों पर किए गए सर्वे में यह बात सामने आई है। कुछ सिविल सोसायटी संगठनों की ओर से किए गए सर्वे में आधे लोगों ने कहा कि उन्होंने कोरोना के संकट की वजह से कम चीजें खाना शुरू किया है और पहले से कम बार खा रहे हैं। सर्वे में 68 फीसदी परिवार ऐसे थे, जिनका कहना है कि उन्होंने खाने के आइटम्स में कटौती की है। वहीं 50 फीसदी लोगों ने यह स्वीकार किया कि पहले वह जितनी बार भोजन करते थे, अब उसके मुकाबले कम खा रहे हैं। यही नहीं 24 फीसदी परिवार तो ऐसे हैं, जिन्हें खाने के लिए राशन भी उधार लेना पड़ा रहा है।

हालांकि इस सर्वे में संतोषजनक बात यह रही है कि 84 फीसदी परिवारों तक सरकार की सार्वजनिक वितरण स्कीम के तहत सब्सिडी वाला और मुफ्त का राशन पहुंचा है। ‘कोरोना वायरस लॉकडाउन: पिछड़े इलाकों पर कितना असर?’ नाम से किए गए सर्वे में 12 राज्यों के 47 जिलों के 5,162 परिवारों की राय ली गई है। इस सर्वे के जरिए यह जानने का प्रयास किया गया कि आखिर कितने परिवारों तक पीडीएस का राशन पहुंचा है और खरीफ की फसल की स्थिति क्या है। सर्वे में मध्य प्रदेश, यूपी, झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, ओडिशा, गुजरात, बिहार, असम और कर्नाटक को शामिल किया गया है।

खत्म हो रहा राशन का स्टॉक: सर्वे में यह बात सामने आई है कि गांवों में गरीब परिवारों के पास तेजी से राशन के स्टॉक की कमी हो रही है। पिछले खरीफ सीजन में मिली फसल का बड़ा हिस्सा अब खत्म होने को है। सर्वे में शामिल एक तिहाई लोगों ने कहा कि उनके पास मौजूद राशन मई के आखिर तक खत्म हो सकता है।

अगली फसल के लिए बीज की भी कमी: इसके अलावा एक तिहाई लोगों ने कहा कि उनके पास आगामी खरीफ की फसल के सीजन के लिए बीज तक नहीं हैं कि वे बुवाई कर सकें। सिविल सोसायटी संगठनों PRADAN, ऐक्शन फॉर सोशल एडवांसमेंट, BAIF, ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया फाउंडेशन, ग्रामीण सहारा, साथी-UP ने मिलकर यह सर्वे किया है।

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