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नहीं रहे अम‍िताभ के समधी: कभी कर्ज चुकाने के ल‍िए बेचना पड़ा था अस्‍पताल, जान‍िए क‍ितना बड़ा है कारोबारी साम्राज्‍य

ट्रैक्टर बनाने वाली कंपनी एस्कॉर्ट्स के मालिक राजन नंदा का 76 साल की उम्र में निधन हो गया। महज 23 साल की उम्र में वर्ष 1965 में कंपनी से जुड़ने वाले नंदा बाद में 1994 में चेयरमैन बने।

Author नई दिल्ली | Updated: August 6, 2018 8:16 PM
अमिताभ बच्चन के समधी राजन नंदा अब इस दुनिया में नहीं रहे।

ट्रैक्टर बनाने वाली कंपनी एस्कॉर्ट्स के मालिक और अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता के सुसर राजन नंदा का 76 साल की उम्र में निधन हो गया। महज 23 साल की उम्र में वर्ष 1965 में कंपनी से जुड़ने वाले नंदा बाद में 1994 में  चेयरमैन बने। उनके पिता एचपी नंदा ने ही इस कंपनी की नींव रखी थी। पिता के बाद राजन कंपनी के मुख्य कर्ता-धर्ता बने। नंदा की मौत ऐसे समय हुई, जब उनकी कंपनी भारी मुनाफा कमा रही है। वित्तीय वर्ष 2018 में कंपनी ने दोगुनी कमाई की। इस साल मई तक कंपनी ने 3.44 अरब की कमाई की। कंपनी का स्टॉक प्राइस भी रिकॉर्ड इजाफे के साथ 1018 पर पहुंच गया है। फिलहाल नंदा के बेटे निखिल  कंपनी के मैनेजिंग एडिटर हैं और वही ट्रैक्टर व्यवसाय को आगे बढ़ा रहे हैं।

इसे संयोग ही कहा जाएगा, कि जिस मेदांता में उनका निधन हुआ, वह जाने-माने कार्डियक सर्जन नरेश त्रेहान चलाते हैं। यह वही चिकित्सक हैं, जो कभी राजन नंदा के स्वामित्व वाले एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर को भी चलाते थे। बाद में नंदा ने वर्ष 2005 में हास्पिटल को फोर्टिस के हाथ 5.85 अरब रुपये में बेच दिया था। दरअसल उस वक्त भारी कर्ज में डूबी अपनी ट्रैक्टर निर्माता कंपनी को संकट से उबारने के लिए नंदा को पैसे की दरकार थी, इस नाते उन्हें हास्पिटल बेचना पड़ा था।

हेल्थकेयर इकलौता सेक्टर नहीं था, जहां से नंदा को असफलता के कारण बाहर निकलना पड़ा, बल्कि उन्हें पश्चिमी यूपी सहित हरियाणा और केरल में शुरू की सेलुलर सर्विस को भी समेटना पड़ गया। हांगकांग की फर्स्ट पैसिफिक कंपनी के साथ मिलकर उन्होंने सेलुलर नेटवर्किंग सेक्टर में बिजनेस शुरू किया था। मगर अगस्त 1997 में बंद होने वाला यह पहला नेटवर्क रहा। बाद में नंदा ने टेलीकॉम बिजनेस को आइडिया सेलुलर को 2004 में बेच दिया। तब समूह पर कुल कर्ज 10 अरब हो गया था। नंदा को एस्कॉर्ट्स के फरीदाबाद, अमृतसर और जयपुर के अस्पताल(निर्माणाधीन) को बेचना पड़ा।

नंदा के लिए उस वक्त मुश्किल घड़ी का सामना करना पड़ा था, जब स्वराज पाल ने शत्रुतापूर्ण ढंग से कंपनी को हथियाने की कोशिश की थी। बाद में स्वराज के भाई से कई दफा बातचीत कर किसी तरह राजीव नंदा मामला सुलझाने में कामयाब रहे। इस प्रकार देखें तो नंदा ने अपने जीवनकाल में कई बिजनेस में हाथ आजमाए मगर आखिर में उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें अपने मूल बिजनेस यानी ट्रैक्टर निर्माण पर ही फोकस रहना चाहिए।

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