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दिहाड़ी मजदूर ने खड़ी कर दी करोड़ों की कंपनी, पढ़ें ज्योति रेड्डी की दिलचस्प कहानी

पारिवारिक हालत इतनी खस्ता थी कि ज्योति ने तीन बार खुदकुशी का प्रयास किया था। एक बार तो अपनी बच्ची को भी जिंदा जलाने की कोशिश कर ली।

गरीबी के दिनों में ज्योति परिवार के साथ एक छोटे से घर में रहती थीं। आज अमेरिका में उनके छह घर हैं, जबकि उनके दो मकान भारत में हैं। (फोटो: फेसबुक)

मुश्किलों को मात देना कोई ज्योति रेड्डी (47) से सीखे। आज वह हमारे बीच किसी नजीर से कम नहीं हैं। एक दौर था, जब उन्हें दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ती थीं। कड़ी घूप में वह तब 10 घंटे तक पत्थर तोड़ती थीं। गरीबी की मार के चलते कई बार घर में अन्न भी खत्म हो जाता था। ऐसे में भूखे पेट ही उन्हें सोना पड़ता था। और आज वह करोड़ों की कंपनी की सॉफ्टवेयर सॉल्यूशंस की सीईओ हैं। यह एक आईटी कंपनी है, जिसका टर्नओवर 2016 में 108 करोड़ रुपए के आसपास था। कंपनी का दफ्तर अमेरिका के एरिजोना स्थित फीनिक्स शहर में है। आइए बताते हैं कैसे तेलंगाना के गांव में रहने वाली ज्योति ने सफलता की बुलंदियों को चूमा।

1985 से 1990 के बीच ज्योति पत्थर तोड़ती थीं। 10 घंटे काम के लिए उन्हें पांच रुपए दिहाड़ी मिलती थी। पर काम के बीच बात भी नहीं करने दी जाती थी। घर के हालात अच्छे नहीं थे, लिहाजा पिता उन्हें व दूसरी बेटी को एक अनाथालय छोड़ आए। वह तब आठ साल की थीं। पर बहन वहां बहुत रोती थी। यही कारण है कि पिता को दोनों को कुछ समय बाद घर वापस लाना पड़ा।

ज्योति 16 बरस की हुईं, तो उनकी शादी कर दी गई। लेकिन शादी के बाद भी उनका जीवन पटरी पर नहीं आ रहा था। पैसों और जरूरतों को लेकर पति से झगड़े होते थे। 17 साल की उम्र में उन्हें पहली संतान हुई, जबकि अगली बच्ची को उन्होंने 18 वर्ष की आयु में जन्म दिया।

पारिवारिक हालत इतनी खस्ता थी कि उन्होंने तीन बार खुदकुशी का प्रयास किया था। एक बार तो अपनी बच्ची को भी जिंदा जलाने की कोशिश कर ली। कुछ समय बाद वह नेहरू युवा केंद्र पर रात में पढ़ाने लगीं। उन्हें वहां 120 रुपए मिलते थे। यह रकम उनके बच्चों के लिए काफी काम आई।

फिर ज्योति ने अंबेडकर ओपन यूनिवर्सिटी से वोकेश्नल कोर्स किया। अमेरिका में अपनी कजिन के पास गईं। पर उससे पहले हैदराबाद में कंप्यूटर की बारीकियां जानी-समझीं। साल 1994 के आसपास उनकी तनख्वाह 5000 रुपए थी। टीचर्स के साथ मिलकर चिट फंड भी चलाती थीं, तो उसमें 25 हजार रुपए कमाए। यूएस जाने में इसी रकम ने उनका साथ दिया।

न्यू जर्सी में वह एक गुजराती परिवार के यहां किराए पर रहीं। उन्होंने तब कई तरह के काम किए। दो साल बाद भारत लौटीं तो एक पुजारी ने सलाह देते हुए कहा था, “तुम वहां कारोबार करोगी, तो करोड़पति बन जाओगी।” उन्होंने इसके बाद धीरे-धीरे अपना कारोबार शुरू किया और आज वह बुलंदियों पर हैं।

गरीबी के दिनों में उनके पास जूते नहीं थे। आज 200 जोड़ी हैं। अमेरिका में छह घर हैं, जबकि दो भारत में है। मर्सिडीज बेंज कार भी है। ज्योति कंपनी के मुनाफे का कुछ हिस्सा अनाथालयों और उनमें रहने वाले बच्चों पर खर्च करती हैं। जानें ज्योति के संघर्ष की कहानी, उन्हीं की जुबानी-

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