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नरेंद्र मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा- न्यायपालिका ने हासिल कर लिए हैं विधायिका से ज्यादा अधिकार

मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि हमारी आर्थिक और राजनीतिक प्रणाली ने अभी वह परिपक्वता हासिल नहीं की है जिसमें हम समस्याओं के समाधान के लिए सधे तरीके से हस्तक्षेप करें।

Author नई दिल्ली | March 2, 2017 6:22 PM
मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) अरविंद सुब्रमणियम। (एक्सप्रेस फोटो)

मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन का मानना है कि भारत की आर्थिक और राजनीतिक प्रणालियों में नपेतुले हस्तक्षेप की परिपक्वता का अभाव है जिसके कारण वह अक्सर प्रतिबंध और अंकुशों पर उतर आती है। यहां एक कार्यक्रम में उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि भारत में न्यायपालिका ने विधायिका से अधिक अधिकार हासिल कर लिए हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज भी कुछ अधिक ही मुकदमेबाज समाज हो गया है। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने देश में स्वतंत्र नियामकीय संस्थानों की वकालत की और कहा कि ये संस्थाएं राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होनीं चाहिए। सुब्रमण्यन ने कहा, ‘मेरा मानना है कि भारत में नियामकीय संस्थाएं अभी विकास के क्रम में हैं। मुझे नहीं लगता कि हमने अभी नियामकीय संस्थानों के मामले में वह परिपक्वता हासिल कर ली है जो होनी चाहिए। इस मामले में हमें ईमानदारी से सच्चाई स्वीकार करनी चाहिए।’ उन्होंने विभिन्न संस्थानों में क्षमता निर्माण पर जोर दिया।

मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि हमारी आर्थिक और राजनीतिक प्रणाली ने अभी वह परिपक्वता हासिल नहीं की है जिसमें हम समस्याओं के समाधान के लिए सधे तरीके से हस्तक्षेप करें।… ऐसे में हम प्रतिबंध और अंकुश जैसे भोथरे हथियारों का इस्तेमाल करते हैं। प्रतिस्पर्धा नीति के क्षेत्र में मेरा मानना है कि जहां भी जरूरी हो वहां नपे तुले अंदाज में हस्तक्षेप किया जाना चाहिए। हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने कहा कि ऐसा करना कोई आसान काम नहीं है। इस लिए सधे भोथरे हथियारों की जगह सधे नपे तुले हस्तक्षेप की क्षमता का विकास करना महत्वपूर्ण है.. और निश्चित तौर पर सभी विनियामकीय संस्थाएं राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होनीं चाहिए।

उन्होंने कहा कि कुछ भी हो, ‘हर मामला अपील में चला जाता है। इस तरह हमारा समाज बहुत अधिक मुकदमेबाजी करने वाला समाज बन गया है।… न्यायापालिका और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं ने विधायिका से ज्यादा अधिकार हालिस कर लिए हैं।’ सुब्रमण्यन ने कहा कि नागर विमानन और सरकारी बैंक, ये कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें ‘निकारी समस्या है।‘ उन्होंने इसी संदर्भ में दिवालिया इकाइयों से निपटने के लिए नए कानून को महत्वपूर्ण बताया।

सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार का सवाल , क्या अब भी एयर इंडिया की जरूरत है?

मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) अरविंद सुब्रमण्यन ने गुरुवार (2 मार्च) को कहा कि निजी क्षेत्र की विमानन कंपनियों की प्रतिस्पर्धा में सरकारी एयरलाइन एयर इंडिया के प्रदर्शन में सुधार हुआ है पर उनके मन में बार बार खयाल आता है कि इस एयर लाइन के ‘बने रहने’ का मतलब क्या है। इस राष्ट्रीय विमानन सेवा कंपनी को डूबने से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने 30,000 करोड़ रुपए का सहायता पैकेज दे रखा है। कंपनी अपनी वित्तीय स्थिति सुधाने के प्रयासों में लगी हुई। मार्च, 2016 में समाप्त वित्त वर्ष में एयरलाइन ने 105 करोड़ रुपए का परिचालन मुनाफा कमाया था। सुब्रमण्यन ने कहा, ‘इंडिगो और जेट एयरवेज के साथ एयर इंडिया का होना, इनमें बिना एयर इंडिया के होने से बिल्कुल अलग है… एक सवाल यह है कि क्या जेट एयरवेज और इंडिगो के साथ एयर इंडिया को भी बनाए रखने की कोई जरूरत रहती है। यह एक ऐसा सवाल है जिसमें हम फिलहाल नहीं जाना चाहेंगे।’ उन्होंने कहा कि मुद्दे की बात यह है कि प्रतिस्पर्धा से एयर इंडिया का प्रदर्शन सुधरा है।

सुब्रमण्यन यहां प्रतिस्पर्धा कानून के अर्थशास्त्र पर राष्ट्रीय सम्मेलन को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। एयर इंडिया 2015-16 में परिचालन लाभ कमा पाई है। हालांकि, एयरलाइन पर 46,570 करोड़ रुपए का कर्ज है। इसमें से 15,900 करोड़ रुपए विमानों के अधिग्रहण के लिए हैं। वित्त वर्ष 2017-18 के बजट में एयरलाइन को 30,231 करोड़ रुपए के राहत पैकेज के तहत 1,800 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है।

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