एयर इंडिया ही नहीं, भारत को परमाणु शक्ति बनाने में भी है टाटा का रोल, जानें होमी जहांगीर भाभा से जुड़ी यह बात

जेआरडी टाटा ने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो शायद डॉ होमी जहांगीर भाभा भी विदेश चले गए होते। यदि ऐसा होता तो भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनने में कई और दशक लग जाते।

JRD Tata Dr Bhabha
1954 की इस तस्वीर में डॉ भाभा और जेआरडी टाटा तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को टीआईएफआर की बिल्डिंग प्लान समझा रहे हैं। (Image Source: tata.com)

भारत की गिनती उन चुनिंदा देशों में होती है, जिसके पास परमाणु शक्ति (Nuclear Power) है। देश को यह उपलब्धि दिलाने में महान वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा (Homi Jehangir Bhabha) का विशेष योगदान है। हालांकि यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे कि देश को एयर इंडिया (Air India) देने वाले जेआरडी टाटा (JRD Tata) का भी इस उपलब्धि में खास रोल है।

JRD से मुलाकात में Dr Bhabha ने की थी शोध संस्थानों की कमी की शिकायत

यह भारत की आजादी से पहले की बात है। मई 1945 में होमी जहांगीर भाभा और जेआरडी टाटा की एक मुलाकात हुई। डॉ भाभा ने तब एक इंजीनियर के रूप में अपने करियर की शुरुआत ही की थी। वह भारत में शोध की सुविधाओं की कमी से दुखी थे। जेआरडी से मुलाकात में डॉ भाभा ने इस बात की शिकायत की। चूंकि तब पूरी दुनिया दूसरे विश्वयुद्ध से जूझ रही थी, इस कारण डॉ भाभा शोध आगे बढ़ाने के लिए विदेश नहीं जा पा रहे थे।

JRD और Dr Bhabha की मुलाकात से सामने आया TIFR

इस मुलाकात ने देश को उत्कृष्ट शोध संस्थानों में से एक दिला दिया। जेआरडी टाटा ने डॉ भाभा को सुझाव दिया कि वह सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (Sir Dorabji Tata Trust) के चेयरमैन सर सोराब डी सकलटवाला से मिलें और शोध संस्थान का प्रस्ताव दें। जेआरडी ने ट्रस्ट के समक्ष शोध संस्थान के प्रस्ताव के समर्थन का वादा किया।

आजीवन TIFR के डायरेक्टर रहे भाभा

डॉ भाभा ने इसके बाद ट्रस्ट को पत्र लिखकर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों के स्तर का भौतिकी शोध संस्थान बनाने में वित्तीय मदद की मांग की। जेआरडी टाटा ने डॉ भाभा के प्रस्ताव का समर्थन किया। इसका परिणाम हुआ कि सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। डॉ भाभा ने जितनी राशि की मांग की थी, वह ट्रस्ट ने उन्हें तत्काल उपलब्ध करा दिया। इस तरह टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) नामक संस्थान सामने आया। डॉ भाभा इसके डायरेक्टर बनाए गए। वह 1966 में एक विमान दुर्घटना में असमय मौत तक इस संस्थान के डायरेक्टर बने रहे।

JRD Tata नहीं होते तो विदेश चले गए होते डॉ भाभा

डॉ भाभा के बाद TIFR के डायरेक्टर बने एमजीके मेनन (MGK Menon) के हवाले से टाटा समूह के एक ब्लॉग में लिखा गया है, ‘‘जेह (JRD Tata) ने मदद न की होती तो आज इतिहास कुछ और होता। तब शायद होमी जहांगीर भाभा विदेश चले गए होते। TIFR जैसा संस्थान नहीं बन पाता।’’

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TIFR ने ही दिया देश को पहला डिजिटल कम्प्यूटर

आपको बता दें कि टीआईएफआर का भारत की वैज्ञानिक तरीके में काफी योगदान है। इसकी स्थापना के साथ ही बेंगलुरू स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) के कॉस्मिक रे विभाग (Cosmic Ray Unit) को इसमें मिला दिया गया था। 1957 में इसी संस्थान ने भारत को पहला डिजिटल कम्प्यूटर (Digital Computer) दिया। सबसे दूरी पर स्थित रेडियो गैलेक्सी का पता लगाने में भी संस्थान का योगदान है। भारत में परमाणु विज्ञान के सारे शुरुआती शोधकार्य और प्रयोग इसी संस्थान में किए गए।

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