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Jobs Crisis In India: इधर ऑटो इंडस्ट्री लहूलुहान, उधर बैंक-इंश्योरेंस-इंफ्रास्ट्रक्चर समेत कई सेक्टरों में घटी हायरिंग की रफ्तार!

Jobs Crisis In India: नई नौकरियों के लिए हायरिंग की धीमी रफ्तार से अर्थव्यवस्था के कई सेक्टर प्रभावित हुए हैं। एक ताजा रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

Jobs Crisis In India: डिमांड में कमी की वजह से देश की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री बड़े संकट से गुजर रही है। दिग्गज कार कंपनियों को अपना प्रोडक्शन घटाना पड़ा है। ऑटो कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियों ने कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले लोगों को नौकरियों से निकालना शुरू कर दिया है। एक आकलन के मुताबिक, लाखों लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं। बहुत सारी कंपनियों ने नई हायरिंग पर भी रोक लगा दी है।

उधर, नई नौकरियों के लिए हायरिंग की धीमी रफ्तार से अर्थव्यवस्था के कई सेक्टर प्रभावित हुए हैं। एक ताजा रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है। बता दें कि हाल ही में आए सरकारी आंकड़ों में यह माना गया था कि देश में बरोजगारी की दर 45 साल के चरम पर है। ऐसे में अधिकतर सेक्टरों में हायरिंग पर असर पड़ना स्वाभाविक लगता है।

केयर रेटिंग्स लिमिटेड की एक स्टडी के मुताबिक, बैंक, इंश्योरेंस कंपनियों, ऑटो मेकर्स से लेकर लॉजिस्टिक और इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों तक में नई नौकरियां देने की रफ्तार घट गई है। केयर रेटिंग्स लिमिटेड ने इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए 1000 कंपनियों की ओर से मार्च आखिर में दाखिल की गई सालाना रिपोर्ट को आधार बनाया है।

अच्छी खबर सिर्फ सर्विस सेक्टर से जुड़ी है, जहां जॉब्स में बेहतरीन ग्रोथ नजर आई। इकॉनमी के मद्देनजर इस सेक्टर को बेहद अहम माना जाता है। नई नौकरियां न पैदा होना घटती डिमांड की वजह से पहले से ही सुस्त पड़ रही अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर नहीं है। भारत दुनिया के सामने निवेश का बड़ा केंद्र के तौर पर खुद को पेश कर रहा है, ऐसे में पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार के सामने भी बेरोजगारी एक बड़ी चुनौती है।

बता दें कि मार्च 2017 में कुल 54 लाख 40 हजार रोजगार का आंकड़ा मार्च 2018 में बढ़कर 57 लाख 80 हजार हो गया जोकि 6.2 प्रतिशत की वृद्धि है। केयर के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2019 के आखिर में यह बढ़ोत्तरी महज 4.3 पर्सेंट रही। इस दौरान कुल नौकरी पाने वालों की संख्या 60 लाख से कुछ ऊपर रही।

केयर के मुताबिक, आयरन, स्टील और माइनिंग कंपनियों में नौकरियां पाने वालों की संख्या घटी। प्रोडक्शन में कम बढ़ोत्तरी और कंपनियों के दिवालिया होने के कई मामलों को इसकी वजह मानी गई। बैंकों में भी हायरिंग की रफ्तार कम रही। कुछ सरकारी बैंकों ने तो नई हायरिंग पर ही रोक लगा दी। ये बैंक अपनी पूंजी बढ़ाने और एनपीए घटाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

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