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नौकरी का बुरा हाल: पीजी कर डिलीवरी बॉय बने 25 हजार युवा, दूसरी तिमाही में केवल 13% कंपनियां हायरिंग के मूड में

कहना गलत नहीं होगा कि उच्च शिक्षा हासिल कर चुके इन युवाओं ने कभी ऑफिस जॉब का सपना देखा होगा, लेकिन फिलहाल उन्हें डिलिवरी बॉय की तरह काम करना पड़ रहा है।

Job crisis, Naukri, employment, unemployment, finance ministry, Modi government, jobs in india, jobs, economy, indian economyपीएम मोदी की मीटिंग का विपक्ष के नेताओं ने किया बहिष्कार ( फाइनेंशियल एक्सप्रेस

इसमें कोई शक नहीं कि देश की अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की कोशिश कर रही केंद्र सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती नए रोजगार पैदा करने की भी है। सरकार ने उन आंकड़ों को सही माना है, जिसके मुताबिक, 2017-18 में बेरोजगारी 45 साल में सबसे ज्यादा रही। बेरोजगारी से जुड़े आंकड़ों में एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि ज्यादा शिक्षित लोगों में ज्यादा बेरोजगारी है।

आंकड़ों के मुताबिक, 2017 में शहरों में निरक्षर लोगों के बीच बेरोजगारी की दर 2.1 फीसदी थी, वहीं सेकेंडरी या इससे अधिक शिक्षा प्राप्त किए लोगों में यह दर बढ़कर 9.2 फीसदी रही। अगर आप शहरों में रह रहे हैं और ऑनलाइन सामान मंगवाते हों तो मुमकिन है कि आपके दरवाजे पर खाना या बाकी चीजें पहुंचाने वाला शख्स पोस्ट ग्रैजुएट हो। टीमलीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ऑनलाइन कंपनियों के लिए डिलिवरी स्टाफ के तौर पर काम करने वाले पोस्ट ग्रैजुएट और ग्रैजुएट युवाओं की संख्या 25 हजार के करीब है।

कहना गलत नहीं होगा कि उच्च शिक्षा हासिल कर चुके इन युवाओं ने कभी ऑफिस जॉब का सपना देखा होगा, लेकिन फिलहाल उन्हें डिलिवरी बॉय की तरह काम करना पड़ रहा है। बाजार से जुड़े एक्सपर्ट्स का मानना है कि बीजेपी को दोबारा मिले मजबूत जनादेश से राजनीतिक स्थायित्व आएगा, जो नई नौकरियों के पैदा होने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। हालांकि, इतनी जल्दी बहुत कुछ होता नजर नहीं आता। कंपनियों की ओर से नई हायरिंग की संभावनाएं फिलहाल बेहद कम हैं।

मैनपावर एम्प्लॉयमेंट आउटलुक सर्वे के एक आंकड़े के मुताबिक, देश की सिर्फ 13 प्रतिशत कंपनियां ही जुलाई से लेकर सितंबर वाली तिमाही में और ज्यादा लोग हायर करने के मूड में नजर आ रही हैं। पिछले साल इसी तिमाही में यह आंकड़ा 16 फीसदी का था। बता दें कि इस सर्वे में विभिन्न इंडस्ट्रीज की कुल 4,951 कंपनियों को शामिल किया गया। सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक, 61 प्रतिशत नौकरी प्रदाता अपने यहां नई जॉब्स की गुंजाइश नहीं देख रहे।

बता दें कि सत्ता पर दोबारा काबिज होने के बाद मोदी सरकार ने भी वित्तीय संकट और बेरोजगारी को बड़ी चुनौती मानते हुए इससे निपटने की दिशा में कदम उठाए हैं। 5 जून को मोदी की अध्यक्षता में 15 मंत्रियों की दो नई कैबिनेट समितियां बनाई गईं। इन समितियों से आर्थिक विकास, निवेश और नई नौकरियां पैदा करने के संदर्भ में सुझाव मांगे गए हैं। सरकार की चिंता का सबब सिर्फ बेरोजगारी के आंकड़े ही नहीं हैं। एनएसएसओ के मुताबिक, 2018-19 की आखिरी तिमाही में देश की विकास दर गिरकर 5.8 फीसदी पर आ पहुंची है।

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