जनसत्ता संवाद: किस कीमत पर दुधारू कंपनियों का सौदा

1991 में जब भारत में आर्थिक सुधार लागू किए गए, तब यह माना गया कि सरकार का काम कारोबार करना नहीं है।

1991 में जब भारत में आर्थिक सुधार लागू किए गए, तब यह माना गया कि सरकार का काम कारोबार करना नहीं है।

सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बेचने पर बहस चल रही है। केंद्र सरकार ने बीपीसीएल यानी भारत पेट्रोलियम में करीब 53 फीसद, शिपिंग कॉरपोरेशन में 67 फीसद और कंटेनर कॉरपोरेशन में करीब 31 फीसद हिस्सा बेचने का फैसला किया गया है। जिस दिन यह फैसला हुआ, उस दिन के बाजार भाव में इन कंपनियों की हिस्सेदारी करीब चौरासी हजार करोड़ रुपए की थी। अगले ही दिन इसमें करीब पांच फीसद की गिरावट हो गई। पहले भी ऐसा हुआ है। सरकार ने जब भी कंपनियों को बेचने का इरादा जताया, उनके दाम गिर गए।

सरकार ने भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल), पोत परिवहन कंपनी भारतीय जहाजरानी निगम (एससीआई) और माल ढुलाई से जुड़ी कंटेनर कॉरपोरेशन आॅफ इंडिया (कॉनकार) में सरकारी हिस्सेदारी बेचने को मंजूरी दे दी है। इसके अलावा सरकार टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन(टीएचडीसी), और नार्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (एनइइपीसीओ) में अपनी हिस्सेदारी सार्वजनिक क्षेत्र की एनटीपीसी को बेचेगी। वहीं सरकार ने इंडियन आॅयल कॉरपोरेशन (आइओसी) समेत चुनिंदा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में हिस्सेदारी को 51 फीसद से नीचे लाने को मंजूरी दी है।

1991 में जब भारत में आर्थिक सुधार लागू किए गए, तब यह माना गया कि सरकार का काम कारोबार करना नहीं है। लेकिन सरकार में यह गड़बड़झाला अभी तक चला आ रहा है कि किस काम को कारोबार माना जाए और किसे राष्ट्रहित? ताजा फैसले के बाद एक सवाल और उठ रहा है कि घाटे वाली कंपनियों को बेचने का तर्क दे रही सरकार मुनाफा देने वाली कंपनियों को भी क्यों बेचने पर तुली है। बीपीसीएल को लेकर ज्यादा राजनीतिक हंगामा मचा है।
थोड़ा अतीत में जाएं। 1991 में विनिवेश नीति लाने के समय लक्ष्य रखा गया 54 हजार करोड़ रुपए जुटाने का। लेकिन 2001 तक सरकार सिर्फ 20078 करोड़ ही जुटा सकी। जीवी रामकृष्ण की अध्यक्षता में विनिवेश आयोग ने 1996 तक 13 रिपोर्ट दिए और उसने 57 कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने की सिफारिश की थी। विनिवेश आयोग ने उन वजहों को खंगाला, जिनकी वजह से विनिवेश का लक्ष्य हासिल नहीं हो सका।

दूसरी ओर, एअर इंडिया, आइटीडीसी या होटल कॉरपोरेशन जैसी कंपनियां हैं, जिनकी बदहाली के कारण और उनकी बातें गाहे-बगाहे सामने आती रही हैं। मंत्रियों, नेताओं, अफसरों लारा सुविधाओं का जमकर दोहन। एअर इंडिया में इकोनॉमी टिकट लेकर बिजनेस क्लास में अपग्रेड कराना। होटलों में रजिस्टर में चढ़ाकर या बिना चढ़ाए, बिना बिल भरे या भारी छूट के साथ कमरों में कब्जा रखा। जाहिर है, इन कंपनियों के सामने फायदा कमाने के मौके हैं, पर व्यवस्था को कुछ सुनाई नहीं दे रहा।

जिस बीपीसीएल को लेकर राजनीतिक सवाल उठ रहे हैं, उसके 30 फीसद शेयर अभी भी सरकार के पास हैं। इसकी कीमत इस वक्त करीब 27 हजार करोड़ रुपए है। कंपनी की कमाई इतनी हो चुकी है कि वो डिविडेंड, टैक्स और खदानों की रॉयल्टी मिलाकर सरकार को सालाना करीब दस हजार करोड़ रुपए देती है। ऐसे में रणनीतिक बिक्री का तर्क सामने आ रहा है। यानी कोई ऐसी कंपनी सरकारी कंपनी पर नियंत्रण के लिए सबसे अच्छा पैसा देगी, जिसके अपने कारोबार को इससे बहुत बड़ा फायदा हो।

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