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सुस्ती की जमी

इस क्षेत्र में सुस्ती का आलम अब तक बना हुआ है। रीयल एस्टेट क्षेत्र पर नजर रखने वाली कंपनी प्राप-इक्विटी के मुताबिक जनवरी से मई के पांच महीनों में मकानों की बिक्री में इकतालीस फीसद की कमी दर्ज हुई है।

रीयल एस्टेट कंपनी यूनिटेक लिमिटेड।

सरकार की तरफ से बराबर यह दावा किया जा रहा था कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था की गति पर कोई असर नहीं पड़ेगा। हाल में आए जीडीपी के आंकड़े उस दावे को आईना दिखा चुके हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि अर्थव्यवस्था के किसी क्षेत्र पर नोटबंदी की सबसे ज्यादा मार पड़ी है तो वह है रीयलिटी सेक्टर। इस क्षेत्र में सुस्ती का आलम अब तक बना हुआ है। रीयल एस्टेट क्षेत्र पर नजर रखने वाली कंपनी प्राप-इक्विटी के मुताबिक जनवरी से मई के पांच महीनों में मकानों की बिक्री में इकतालीस फीसद की कमी दर्ज हुई है। अलबत्ता यह आंकड़ा देश के केवल बयालीस प्रमुख शहरों के अध्ययन पर आधारित है। पर इससे अर्थव्यवस्था के इस क्षेत्र के रुझान का पता तो चलता ही है। पिछले साल इन्हीं पांच महीनों में जहां 1.87 लाख इकाइयों की बिक्री हुई थी, वहीं इस साल की उसी अवधि में 1.10 लाख इकाइयों की ही बिक्री हुई। इससे मांग में कमी और बाजार में सुस्ती ही प्रमाणित होती है। नोटबंदी के आठ महीने बाद भी यह हालत क्यों है? रीयलिटी सेक्टर में सुस्ती कब टूटेगी और निवेशकों का भरोसा कब लौटेगा?

बहुत-से लोगों का मानना है कि जो मंदी जैसी स्थिति दिख रही है वह अस्थायी या संक्रमणकालीन है। जल्दी ही हालात सामान्य हो जाएंगे और निवेशक पहले से कहीं ज्यादा भरोसे के साथ पैसा लगाएंगे। आखिर अपना घर बनाने का सपना हर भारतीय परिवार की सबसे बड़ी महत्त्वाकांक्षा होती है और यह पैसा लगाने का सबसे सुरक्षित मद भी होता है। इसके लिए आम लोग जीवन भर की बचत की पूंजी लगा देते हैं या लगाने को तैयार रहते हैं। अगर रीयलिटी सेक्टर में ठहराव दिख रहा है तो इसलिए कि बहुत सारे संभावित खरीदार ठिठके हुए हैं। नोटबंदी ने एक तरफ उन्हें असमंजस में डाल दिया है, पर दूसरी तरफ साधारण निवेशकों में यह उम्मीद भी जगाई है कि वे अब पहले से कहीं अधिक तर्कसंगत कीमत पर मकान पा सकेंगे। रीयलिटी सेक्टर की गिनती अर्थव्यवस्था के ऐसे क्षेत्रों में होती रही है जहां भारी मात्रा में नकद लेन-देन, यहां तक कि काले धन के इस्तेमाल का भी काफी चलन रहा है। नोटबंदी ने इस पर अंकुश लगा दिया। फिर, रीयल एस्टेट नियामक कानून तथा बेनामी संपत्ति (निरोधक) संशोधित अधिनियम के क्रियान्वयन ने भी आवास निर्माण के कारोबार में पारदर्शिता का रास्ता साफ किया है। उदारीकरण का दौर शुरू हुआ तो रीयल एस्टेट सेक्टर में काफी तेजी आई। इसलिए कि कारोबारी गतिविधियां तेज हुर्इं तो व्यावसायिक कार्यालयों-परिसरों के निर्माण में भी तेजी आई, सत्कार उद्योग (होटल, रिसॉर्ट) में बढ़ोतरी से भी इसे गति मिली। स्कूल, कॉलेज, अस्पताल-नर्सिंग होम आदि में निजी क्षेत्र की पूंजी ने भी निर्माण उद्योग के लिए मौके बढ़ा दिए। पर तेजी की एक वजह और थी।

जमीन-जायदाद काला धन खपाने का यों तो हमेशा से एक प्रमुख जरिया रहा है, पर पिछले डेढ़-दो दशक में इसने काले धन को अपूर्व तेजी से आकर्षित किया। नतीजतन, कीमतें मनमाने तरीके से चढ़ती रहीं, और लागत से बिक्री-मूल्य के बीच जमीन-आसमान का अंतर दिखता था। अच्छी बात है कि इस पर रोक लगी है। यह भी अच्छा हुआ कि रीयलिटी सेक्टर में ग्राहकों को ठगना आसान नहीं रह गया है और पारदर्शिता से काम करने वालों के लिए गुंजाइश बढ़ी है। पर लगता है कि ग्राहकों की हिचक अब भी बनी हुई है। अगर कहीं सुस्ती टूटती दिख रही है तो एकदम किफायती आवास के मामले में, जहां सरकार ने ब्याज में छूट या सबसिडी जैसे प्रोत्साहन की तजवीज की है। पर अर्थव्यवस्था का यह क्षेत्र रोजगार का भी एक बड़ा स्रोत है। इसलिए इसमें महीनों से सुस्ती बने रहना एक चिंताजनक पहलू है।

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