क्या मजबूत रुपया हमेशा मजबूत अर्थव्यवस्था की निशानी होता है? योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का मानना है कि मुद्रा की ताकत को राष्ट्रवाद का प्रतीक मानना सही नहीं है। उनका तर्क है कि मुद्रा की मजबूती अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाती है, न कि अत्यधिक हस्तक्षेप के माध्यम से कृत्रिम रूप से लागू की जानी चाहिए।
हाल ही में द इंडियन एक्सप्रेस के आइडिया एक्सचेंज कार्यक्रम में बोलते हुए अहलूवालिया ने कहा कि भारत को हर हाल में मजबूत रुपये का लक्ष्य नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने ऐसे समय में यह टिप्पणी की है जब वैश्विक तेल कीमतों, विदेशी निवेश निकासी, डॉलर की बढ़ती मांग और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है।
अहलूवालिया ने कहा कि रुपये की चाल को बड़े आर्थिक हालात का सिग्नल समझना चाहिए, न कि किसी ऐसे टारगेट के तौर पर जिसे हर कीमत पर बचाया जाए।
उन्होंने कहा, “यह सच है, अगर इकॉनोमी मजबूत है, तो रुपये की कीमत बढ़ेगी। इसलिए रुपये की कीमत बढ़ना इकॉनोमी के मजबूत होने का सिग्नल है।” “और जब इकॉनमी कमजोर होती है, तो कई कारणों से, रुपया कम होता है, जो इस आर्थिक स्थिति को दिखाता है।”
उन्होंने कहा कि जब मार्केट के हालात डेप्रिसिएशन की ओर इशारा कर रहे हों, तब रुपये को मजबूत बनाने की कोशिश करने से समस्या और बढ़ सकती है।
अहलूवालिया ने कहा, “जब मार्केट के हालात डेप्रिसिएशन की ओर इशारा कर रहे हों, तब रुपये को मजबूत बनाने से इकॉनमी और कमजोर होगी।”
‘मजबूत रुपया’ का मतलब मजबूत इकॉनोमी नहीं होता।
अहलूवालिया का मुख्य पॉइंट आसान था एक मजबूत करेंसी एक मजबूत इकॉनमी को दिखा सकती है, लेकिन यह उसकी जगह नहीं ले सकती है।
दूसरे शब्दों में समझें तो अगर प्रोडक्टिविटी, एक्सपोर्ट, इन्वेस्टमेंट फ्लो और मैक्रोइकॉनमिक फंडामेंटल्स मजबूत हैं, तो करेंसी स्वाभाविक रूप से मजबूत हो सकती है। लेकिन अगर इकॉनमी पर दबाव है (जैसे कि ज़्यादा इम्पोर्ट कॉस्ट, कैपिटल आउटफ्लो, बढ़ता ट्रेड डेफिसिट या ग्लोबल डॉलर की मजबूती झ तो करेंसी को आर्टिफिशियली ऊंचा रखने के लिए मजबूर करने से एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस को नुकसान हो सकता है।
यह इसलिए मायने रखता है क्योंकि मजबूत रुपया इम्पोर्ट को सस्ता बनाता है, लेकिन यह एक्सपोर्ट को कम कॉम्पिटिटिव भी बना सकता है। दूसरी ओर, कमजोर रुपया क्रूड ऑयल, इलेक्ट्रॉनिक्स, फर्टिलाइजर और एडिबल ऑयल जैसे इम्पोर्टेड सामानों की लागत बढ़ाता है, लेकिन विदेशी मार्केट में भारतीय सामानों को सस्ता बनाकर एक्सपोर्टर्स को सपोर्ट कर सकता है।
भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी क्रूड ऑयल की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इम्पोर्ट करता है और मैन्युफैक्चरिंग एक्सपोर्ट भी बढ़ाना चाहता है, करेंसी मैनेजमेंट हमेशा एक बैलेंसिंग एक्ट होता है।
महंगा क्यों हो सकता है रुपये का बचाव करना
अहलूवालिया ने यह भी चेतावनी दी कि रुपये का बहुत ज्यादा बचाव करने से फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व का नुकसान हो सकता है।
उन्होंने कहा, “अगर आप बहुत सारा रिजर्व खोना चाहते हैं तो आप ऐसा कर सकते हैं। ज्यादातर संभावना है कि यह काम नहीं करेगा। लेकिन इससे इकॉनमी कमजोर होगी।”
आरबीआई आमतौर पर फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए दखल देता है, न कि रुपये को किसी खास लेवल पर फिक्स करने के लिए। जब करेंसी पर तेज दबाव आता है तो यह रुपये को सपोर्ट करने के लिए अपने फॉरेन एक्सचेंज रिज़र्व से डॉलर बेच सकता है। लेकिन बार-बार डॉलर बेचने से रिजर्व कम हो जाता है।
इसीलिए इकोनॉमिस्ट अक्सर अव्यवस्थित मूवमेंट को रोकने और एक खास एक्सचेंज रेट का बचाव करने के बीच फर्क करते हैं। पहला करेंसी मैनेजमेंट का हिस्सा है। दूसरा महंगा हो सकता है अगर मार्केट का दबाव मज़बूत और लगातार बना रहे।
कोलोनियल इतिहास और रुपये पर बहस
अहलूवालिया ने भारत के इकोनॉमिक इतिहास का भी हवाला देते हुए समझाया कि मजबूत रुपये का जुनून क्यों गलत है।
उन्होंने कहा कि 20वीं सदी की शुरुआत में भारतीय राष्ट्रवादी और सामाजिक नेताओं ने एक्सचेंज रेट को बनावटी तौर पर बढ़ाने के लिए ब्रिटिश सरकार की आलोचना की थी। उस आलोचना के अनुसार, कॉलोनियल सरकार की एक्सचेंज-रेट पॉलिसी ने भारत के लिए एक्सपोर्ट करना और मुश्किल बना दिया था।
उन्होंने कहा, “हमारे अपने इतिहास में, 20वीं सदी के शुरुआती हिस्सों में, हमारे राष्ट्रवादी, राजनीतिक और सामाजिक साथी असल में ब्रिटिश सरकार पर एक्सचेंज रेट को बढ़ाने के लिए उसे ठीक करने का आरोप लगा रहे थे।”
अहलूवालिया ने तर्क दिया कि इससे पता चलता है कि एक मज़बूत करेंसी को हमेशा अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं माना गया है। कभी-कभी, एक ओवरवैल्यूड करेंसी एक्सपोर्टर्स और घरेलू प्रोड्यूसर्स को नुकसान पहुंचा सकती है।
रुपये का मौजूदा दबाव इन बातों को समय के हिसाब से जरूरी बनाता है।
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